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फिल्मी दुनिया की चमक-दमक अक्सर सफलता, स्टारडम और करोड़ों की कमाई से जुड़ी दिखाई देती है, लेकिन इस जगमगाहट के पीछे असफलता का अंधेरा भी उतना ही गहरा होता है. कई बार एक फिल्म जब बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप होती है, तो उससे जुड़े लोगों का आत्मविश्वास और सपनों को तोड़ कर रख देती है.
नई दिल्ली. दिवंगत एक्टर और निर्देशक सतीश कौशिक के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था. वो जितने शानदार कलाकार थे, उतने ही उम्दा निर्देशक भी थे. लेकिन जब एक बार उनकी फिल्म फ्लॉप हुई तो वो निराश और हताश हो गए थे. डायरेक्टर इतनी बुरी तरह टूट गए थे कि उन्होंने अपनी जिंदगी खत्म करने का मन बना लिया था.

ये किस्सा बॉलीवुड की सबसे सफल जोड़ियों में शुमार श्रीदेवी और अनिल कपूर की फिल्म ‘रूप की रानी चोरों का राजा’ का है. 90 के दशक की शुरुआत में यह फिल्म हिंदी सिनेमा की सबसे भव्य और महंगी परियोजनाओं में गिनी जाती थी.

अनिल कपूर और श्रीदेवी जैसे बड़े सितारों से सजी इस फिल्म से इंडस्ट्री को भारी उम्मीदें थीं. निर्माता बोनी कपूर ने इस प्रोजेक्ट पर लाखों रुपये दांव पर लगाए थे, जबकि निर्देशन की कमान सतीश कौशिक के हाथों में थी. भव्य सेट, विशाल बजट, चर्चित स्टारकास्ट और मशहूर लेखक जावेद अख्तर की कहानी, हर पहलू इसे एक बड़ी सफलता की ओर इशारा करता था. लेकिन जब फिल्म रिलीज हुई, तो नतीजा उम्मीदों के बिल्कुल उलट निकला.
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16 अप्रैल 1993 को सिनेमाघरों में पहुंची यह फिल्म दर्शकों के दिलों में जगह नहीं बना सकी और बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह असफल साबित हुई. यह सिर्फ एक फिल्म की हार नहीं थी, बल्कि उन लोगों के लिए गहरा भावनात्मक झटका था, जिन्होंने इसमें अपना सबकुछ झोंक दिया था. सतीश कौशिक के लिए यह असफलता बेहद व्यक्तिगत बन गई थी.

सेलिब्रिटी चैट शो ‘जीना इसी का नाम है’ में सतीश कौशिक ने खुद स्वीकार किया था कि फिल्म के फ्लॉप होने के बाद वह मानसिक रूप से इतने टूट गए थे कि उनमें प्रोड्यूसर बोनी कपूर से यह पूछने तक की हिम्मत नहीं बची थी कि फिल्म का प्रदर्शन कैसा चल रहा है.

वहीं बोनी कपूर ने उस मुश्किल दौर को याद करते हुए बताया कि सतीश की निराशा इतनी गहरी थी कि उन्होंने आत्महत्या तक के बारे में सोच लिया था. बोनी के मुताबिक, एक वक्त ऐसा भी आया जब सतीश चलती कार से कूदने को तैयार थे. होटल पहुंचने के बाद भी वह पहली मंजिल से छलांग लगाने जैसी बातें कर रहे थे.

हालांकि, इस बेहद गंभीर पल में भी सतीश कौशिक की सहज हास्य भावना कहीं न कहीं मौजूद थी. उन्होंने बाद में मजाकिया अंदाज में बताया कि जब वह होटल की पहली मंजिल पर खड़े थे, तो नीचे खाने का इंतजाम लगा हुआ था. उस क्षण उनके मन में यह ख्याल आया कि अगर वह नीचे कूदे, तो लोग शायद यह समझेंगे कि वह खाने के लिए छलांग लगा रहे हैं. इसकी वजह से उन्होंने छलांग लगाने का आइडिया छोड़ दिया.
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