Last Updated:
अगर आपको लगता है कि कमल हासन की क्लासिक फिल्म ‘सदमा’ की एंडिंग बहुत दर्दनाक है, तो आपको 1978 में रिलीज हुई फिल्म ‘मारो चरित्र’ देखनी चाहिए. फिल्म की इमोशनल कहानी और दुखद क्लाइमैक्स ने दर्शकों को सदमा में डाल दिया था. फिल्म का ऐसा असर हुआ था कि कई परिवार तबाह हो गए थे. एक्सपर्ट ने इसके मनोवैज्ञानिक पहुलओं को समझने की कोशिश की. खासकर, युवाओं पर फिल्म की कहानी पर गहरा असर पड़ा था. फिल्म की कहानी प्यार और उसके पारिवारिक विरोध पर बनी थी.
नई दिल्ली: यह जानते हुए कि फिल्म सिर्फ एक कहानी है, फिर भी दर्शक कुछ फिल्मों से इतना सच्चा कनेक्शन फील करते है कि उनकी जिंदगी फिर पहले जैसी नहीं रहती. कमल हासन की कुछ फिल्मों ने दर्शकों पर बहुत गहरा असर डाला है, जिनमें से एक है- ‘मारो चरित्र.’ इस सुपरहिट मगर मनहूस फिल्म ने कई घर बर्बाद कर दिए थे.

1978 में रिलीज हुई ‘मारो चरित्र’ में कमल हासन और सरिता ने अहम भूमिका निभाई थी. दिग्गज निर्देशक के. बालाचंदर ने इस फिल्म का निर्देशन किया था. फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सुपरहिट रही, लेकिन इसके साथ एक गहरा दर्द भी जुड़ा रहा है.

‘मारो चरित्र’ युवाओं के बीच उस दौर में जबरदस्त लोकप्रिय हुई थी. इसकी कहानी एक तमिल लड़के और एक तेलुगु लड़की के इर्द-गिर्द घूमती थी. कल्चर और भाषाई अंतर के बावजूद दोनों एक-दूसरे के प्यार में पड़ जाते हैं. फिल्म का संगीत और कहानी लोगों के दिलों को सीधे छू गई थी.
Add News18 as
Preferred Source on Google

फिल्म में दिखाया गया कि कैसे उनके रिश्ते को परिवारों के कड़े विरोध का सामना करना पड़ता है. यह विरोध ही फिल्म की सबसे बड़ी इमोशनल धुरी बना. प्रेमी कपल हर मुमकिन कोशिश करता है कि वे साथ रह सकें. लेकिन अंत में कहानी एक ऐसा मोड़ लेती है जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी.

फिल्म के क्लाइमैक्स ने दर्शकों पर सबसे ज्यादा असर डाला और काफी चर्चा में रहा. अंत में किरदार अपने प्यार के विरोध से तंग आकर एक बड़ा और दुखद कदम उठाते हैं. इस सीन की इंटेंसिटी इतनी ज्यादा थी कि इसने संवेदनशील दर्शकों के मन पर गहरा असर डाला. लोग सिनेमा हॉल से भारी मन लेकर बाहर निकलते थे.

उस समय की रिपोर्ट्स में एक बेहद चौंकाने वाला दावा किया गया था. कहा जाता है कि फिल्म के क्लाइमैक्स से प्रभावित होकर करीब 20 से 40 जोड़ों ने अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली थी. यानी करीब 40 से 80 लोगों के परिवारों में मातम पसर गया था. इसने सिनेमा के युवाओं की सोच पर पड़ने वाले असर को लेकर एक बड़ी बहस छेड़ दी थी.

फिल्म के निर्देशक के. बालाचंदर ने बाद में इस दर्दनाक असर पर खुलकर बात की थी. उन्होंने फिल्म की भारी सफलता और इससे जुड़े अनचाहे परिणामों पर दुख जताया था. एक तरफ फिल्म को सराहना मिल रही थी, तो दूसरी तरफ ऐसी खबरों ने उन्हें परेशान कर दिया था. यह उनके लिए एक कड़वा अनुभव जैसा था.

‘मारो चरित्र’ आज भी भारतीय सिनेमा के इतिहास में अपनी कहानी के लिए याद की जाती है. यह फिल्म इस बात का उदाहरण है कि सिनेमा लोगों की भावनाओं के साथ कितना गहरा जुड़ाव रख सकता है. भले ही इसके साथ दुखद घटनाएं जुड़ी रहीं, लेकिन इसकी गिनती बेहतरीन क्लासिक्स में होती है. फिल्म की विरासत आज भी चर्चाओं में जीवित है.
![]()










