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हिंदी सिनेमा के दिग्गज अभिनेता ए.के. हंगल को लोग आज भी ‘शोले’ के रहीम चाचा के रूप में याद करते हैं. उनका मशहूर डायलॉग ‘इतना सन्नाटा क्यों है भाई’ आज भी लोगों की जुबान पर है. पर्दे पर अक्सर बुजुर्ग, पिता, चाचा और आम आदमी के किरदार निभाने वाले ए.के. हंगल की असल जिंदगी भी किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं थी.
नई दिल्ली. फिल्मों में आने से पहले ए.के. हंगल ने आजादी की लड़ाई में हिस्सा लिया, जेल की सजा काटी, थिएटर किया और दर्जी का काम भी किया. खास बात यह रही कि उनके पिता चाहते थे कि बेटा सरकारी नौकरी करे, लेकिन हंगल ने अपने लिए अलग रास्ता चुना और आखिरकार अपनी मेहनत के दम पर फिल्मों में एक खास पहचान बनाई.
ए.के. हंगल का पूरा नाम अवतार किशन हंगल था. उनका जन्म 1 फरवरी 1914 को सियालकोट में हुआ था, जो अब पाकिस्तान में है. उनका बचपन और युवावस्था पेशावर में बीती. उनके पिता सरकारी नौकरी में थे और चाहते थे कि बेटा भी एक सुरक्षित सरकारी नौकरी करे. लेकिन हंगल का मन इस रास्ते में नहीं लगा.
कम उम्र में ही वह आजादी के आंदोलन से जुड़ गए थे. साल 1929 से 1947 के बीच उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई. उन्होंने सरकारी नौकरी करने के बजाय दर्जी का काम सीखा और पेशावर में टेलर के रूप में काम करने लगे.हालांकि, दर्जी का काम उनके लिए सिर्फ रोजी-रोटी कमाने का जरिया नहीं था. उन्होंने अपने साथ काम करने वाले दूसरे दर्जियों की परेशानियों को भी समझा और उनके हक के लिए आवाज उठाई. वह मजदूरों को संगठित करने और उनके लिए ट्रेड यूनियन बनाने की कोशिश करते रहे.
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दर्जी का काम करते हुए भी उनका झुकाव थिएटर की तरफ था. साल 1936 में वह पेशावर के एक थिएटर ग्रुप से जुड़े और यहीं से एक्टिंग के प्रति उनका लगाव और बढ़ता चला गया. आजादी के आंदोलन के साथ-साथ रंगमंच भी उनकी जिंदगी का अहम हिस्सा बन गया.
मुंबई आने के बाद उन्होंने थिएटर को पूरी तरह अपना लिया. वह इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन यानी आईपीटीए से जुड़े. यहां उन्हें बलराज साहनी और कैफी आजमी जैसे बड़े कलाकारों के साथ काम करने का मौका मिला. करीब 15 साल तक थिएटर में काम करने के बाद उन्होंने फिल्मों की तरफ रुख किया.
फिल्मों में आने के वक्त ए.के. हंगल की उम्र 52 साल थी. इतनी उम्र में फिल्मी करियर शुरू करना आसान नहीं था, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी. साल 1966 में बसु भट्टाचार्य की फिल्म ‘तीसरी कसम’ से उन्होंने हिंदी फिल्मों में कदम रखा.इसके बाद ए.के. हंगल ने पीछे मुड़कर नहीं देखा. वह ‘गुड्डी’, ‘बावर्ची’, ‘अभिमान’, ‘नमक हराम’, ‘चुपके चुपके’, ‘आंधी’, ‘तपस्या’, ‘शौकीन’, ‘अवतार’ और ‘अर्जुन’, सत्यम शिवम सुंदर जैसी कई यादगार फिल्मों में नजर आए. इस ब्लॉकबस्टर फिल्म में उन्होंने जीनत अमान के चाचा का रोल निभाया था.
साल 1975 में आई फिल्म ‘शोले’ ने उनकी पहचान को एक अलग मुकाम पर पहुंचा दिया. फिल्म में उन्होंने रहीम चाचा का किरदार निभाया था. उनका डायलॉग ‘इतना सन्नाटा क्यों है भाई’ आज भी हिंदी सिनेमा के सबसे मशहूर डायलॉग्स में शामिल है.ए.के. हंगल ने अपने लंबे करियर में 200 से ज्यादा फिल्मों में काम किया. साल 2001 में आई फिल्म ‘लगान’ में शंभू काका का किरदार भी उनके यादगार रोल्स में गिना जाता है.
भारतीय सिनेमा में उनके योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने साल 2006 में उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया. फिल्मों के अलावा वह टीवी पर भी नजर आए. अपने करियर के आखिरी दौर में उन्होंने ‘मधुबाला-एक इश्क एक जुनून’ में भी काम किया.साल 2012 में उनकी तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था. इसके बाद 26 अगस्त 2012 को मुंबई में उनका निधन हो गया. ए.के. हंगल भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके निभाए किरदार और उनकी फिल्मों की यादें आज भी लोगों के दिलों में जिंदा हैं.











