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महान गायक मुकेश की 50वीं पुण्यतिथि पर दिल्ली-6 में उनके अमर गीत गूंजे. 27 अगस्त 1976 को उनका निधन हुआ था. उनका पूरा नाम मुकेश चंद माथुर था. उनका जन्म 22 जुलाई 1923 को दिल्ली-6 के चहलपुरी के एक मध्यमवर्गीय माथुर कायस्थ परिवार में हुआ था.
Photo Credit/Instagram@neilnitinmukesh
दिल्ली-6 की नई सड़क और चहलपुरी के भीड़भरे गलियारों में 27 अगस्त को टहलते हुए कई दुकानों से रेडियो पर मुकेश के अमर गीत गूंज रहे थे-‘ज़िंदा हूँ मैं इस तरह से…’, ‘मेरा जूता है जापानी…’, ‘ये मेरा दीवानापन है…’, ‘किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार…’, ‘इक दिन बिक जाएगा माटी के मोल…’, ‘मैं पल दो पल का शायर हूं…’ और ‘दुनिया बनाने वाले क्या तेरे मन में समायी…’. पहले समझ नहीं आया कि आज अचानक ये स्वर क्यों बज रहे थे. फिर पता चला कि आज महान पार्श्वगायक मुकेश की पचासवीं पुण्यतिथि है. उनकी मृत्यु 27 अगस्त 1976 को हुई थी.
मुकेश चंद माथुर का जन्म 22 जुलाई 1923 को दिल्ली-6 के चहलपुरी के एक मध्यमवर्गीय माथुर कायस्थ परिवार में हुआ था. वे दस भाई-बहनों में छठे थे. पिता लाला जोरावर चंद माथुर इंजीनियर थे और माता चांद रानी गृहिणी. स्कूली शिक्षा मंदिर मार्ग के एम.बी. स्कूल (बाद में एनपी स्कूल, अब अटल आदर्श बाल विद्यालय) में हुई, जहां क्रिकेटर मोहिंदर अमरनाथ भी पढ़े. बचपन से ही वे के.एल. सहगल के दीवाने थे और उनके गीत गुनगुनाते रहते थे. दिन में बिड़ला मंदिर की जन्माष्टमी पर भजन गाते और शाम को चहलपुरी के आसपास के आयोजनों में स्वर देते. यहीं से गायकी की शुरुआत मानी जाती है. दसवीं के बाद पढ़ाई छोड़कर कुछ समय दिल्ली के लोक निर्माण विभाग में नौकरी भी की.
रिश्तेदार ने सुनी आवाज और ले गए मुंबई
बहन की शादी में गाते हुए दूर के रिश्तेदार अभिनेता मोतीलाल ने उनकी आवाज सुनी और मुंबई ले गए. पंडित जगन्नाथ प्रसाद से प्रशिक्षण मिला. शुरुआती फिल्म ‘निर्दोष’ फ्लॉप हुई तो शेयर ब्रोकर और सूखे मेवे बेचने तक का काम करना पड़ा. फिर 1945 की ‘पहली नजर’ में ‘दिल जलता है तो जलने दे’ ने पहचान दिलाई. इतनी सहगल-सी आवाज थी कि स्वयं सहगल ने कहा था कि“अजीब बात है, मुझे याद नहीं कि मैंने ये गीत गाया.” अनिल विश्वास और नौशाद ने उन्हें नकल से निकालकर अपनी शैली दी. अनिल विश्वास ने ही ‘दिल जलता है तो जलने दे’ जैसा मौका दिया. राज कपूर ने कहा—“मुकेश मेरी रूह है, मैं सिर्फ शरीर हूँ.” उन्होंने राज कपूर के लिए करीब 110 गीत गाए. दिलीप कुमार और मनोज कुमार के लिए भी गाया. करीब 1200-1300 गीत गाए. राष्ट्रीय पुरस्कार ‘रजनीगंधा’ के ‘कई बार यूंही देखा है’ पर मिला. चार फिल्मफेयर पुरस्कार भी. वे कहते थे कि दस खुश गीतों के बदले एक दर्द भरा गीत ले लेंगे.
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