नई दिल्ली: हम जिस हिंदी गाने की बात कर रहे हैं, जब उसे दर्शक पर्दे पर सुनते-देखते थे, तो वे रोने लगते थे. लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने जब इस कालजयी गाने को लता मंगेशकर से गवाया था, तो उन्हें भी हैरानी हुई कि वे ऐसी अद्भुत धुनें बना सकते हैं. कहते हैं तब लता मंगेशकर ने भी इमोशनल होकर यह गाना गाया था. जब गाना बनकर सामने आया, तो राज खोसला अभिभूत हो गए थे. यह गाना दो-तीन हिस्सों में रिकॉर्ड हुआ था.
लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल यूं ही बड़े संगीतकार नहीं बने थे. उन्होंने कई नायाब गाने हिंदी सिनेमा को दिए जो आज भी लोगों के दिलों को सुकून पहुंचाते हैं. उनका रचा एक गाना इतना शानदार बना था, जिसके छह शब्द सुनकर लीजेंड डायरेक्टर राज खोसला फूट-फूटकर रोने लगे थे. हम फिल्म ‘मैं तुलसी तेरे आंगन की’ के टाइटल सॉन्ग की बात कर रहे हैं, जिसके बनने का किस्सा भी बड़ा अनूठा है. राज खोसला ने जब लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल को फिल्म की कहानी समझाई कि नायक दूसरी शादी कर लेता है, अपनी बीवी के लिए सौतन लेकर आ जाता है. मगर दूसरी बीवी को वह हक नहीं मिल पाता, जिसकी वह हकदार होती है. वह दहलीज लांघकर घर के अंदर नहीं आ पाती. उन्होंने तुलसी को कैरेक्टर की तरह दर्शाया.
आंसू नहीं रोक पाए राज खोसला
राज खोसला को भले लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल पर भरोसा था, मगर किसी सिचुएशन पर गाना बनाना अपने-आप में बड़ा चैलेंज होता है. संगीतकार जोड़ी के साथ गीतकार आनंद बक्शी ने सिचुएशन को समझा और दो पंक्ति लिखी- ‘मैं तुलसी तेरे आंगन की, कोई नहीं मैं तेरे साजन की.’ मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने जब यह मुखड़ा कंपोज किया, तो लाइन ‘कोई नहीं मैं तेरे साजन की’ राज खोसला के जेहन में अटक गई. वे अपने आंसू नहीं रोक पाए. संगीतकार जोड़ी की आंखों के आगे से पूरा मंजर गुजर रहा था.
दुविधा से जब घिर गए लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल
लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने जब गाने का अंतरा कंपोज किया, तो राज खोसला फूट-फूटकर रोने लगे. संगीतकार जोड़ी को बड़ा अजीब लगा, क्योंकि उन्होंने इतना अच्छा गीत बनाया था, मगर डायरेक्टर तो फूट-फूटकर रो रहे हैं. उन्होंने सोचा कि क्या गीत बनाने में उनसे कोई गलती हो गई है? वे राज खोसला के पास पहुंचे और बोले कि क्या हमें कोई दूसरी धुन बनानी चाहिए? राज खोसला भावुक होकर बोले कि इस सिचुएशन में इससे अच्छी धुन कोई बन ही नहीं सकती.
जब दोबारा रिकॉर्ड हुआ गाना
गाना एक अन्य सिचुएशन में दोबारा पिक्चराइज होता है, जिसमें आशा पारेख के किरदार का निधन हो जाता है. उनकी अर्थी जब नूतन के घर के पास से गुजरती है, तो एक लाइन आती है- ‘मत रो बहना अंदर जाके’, उसने तो हर किसी को रुला दिया था. लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने फिल्म में मोहम्मद रफी से एक गाना भी गवाया था, मगर टाइटल सॉन्ग की बात ही कुछ अलग थी.
लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल पर राज खोसला का भरोसा
राज खोसला ने लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के साथ कई फिल्में बनाईं. हालांकि, शुरुआत में वे अपनी फिल्मों में मदन मोहन का संगीत लेते थे, मगर जब उन्होंने फिल्म ‘अनीता’ के लिए लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल को चुना, तो वे गाने सुनकर हैरान रह गए थे. उन्होंने फिर ‘दो रास्ते’ और ‘मेरा गांव मेरा देश’ जैसी फिल्में दीं. उनके गली-गली में गाने बजते थे. हर सुचिएशन के परफेक्ट गाने रचते थे.










