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प्रोड्यूसर संजय शर्मा फिल्म ‘सहिया’ को सेंसर सर्टिफिकेट न मिलने से नाराज और परेशान हैं. उन्होंने दावा किया कि आदिवासी इलाकों में फिल्म की शूटिंग होने की वजह से इसे नक्सलवाद से जुड़े होने का आरोप लगाया. उन्होंने फिल्म ‘सहिया’ को लेकर सेंसर बोर्ड और अधिकारियों के रवैये पर सवाल उठाए. अगर फिल्म सेंसर बोर्ड से पास नहीं होगी, तो वे अदालत का दरवाजा खटखटाएंगे.
फिल्म ‘सहिया’ को संजय शर्मा ने प्रोड्यूस किया है (फोटो साभार: IANS)
नई दिल्ली: फिल्म ‘सहिया’ के प्रोड्यूसर संजय शर्मा इसे सेंसर सर्टिफिकेट दिलाने के चलते मुश्किल दौर से गुजर रहे हैं. फिल्म की कहानी छत्तीसगढ़ के जंगलों और आदिवासी समाज के बीच बुनी गई एक प्रेम कहानी है, लेकिन संजय शर्मा ने कहा कि सीबीएफसी ने फिल्म पर नक्सलवाद से जुड़े होने का आरोप लगाकर इसे पास करने में अड़चन पैदा कर दी है.
प्रोड्यूसर ने नाराजगी जताते हुए कहा कि फिल्म में कहीं भी नक्सलवाद को बढ़ावा नहीं दिया गया बल्कि इसके उलट पूरी कहानी हिंसा के खिलाफ है. उन्होंने कहा कि अगर रिव्यू कमेटी भी फिल्म को पास नहीं करती है तो वह कोर्ट का दरवाजा खटखटाएंगे और उन्हें पूरा भरोसा है कि अदालत फिल्म को देखेगी और उसे पास करेगी. संजय शर्मा ने आईएएनएस से बातचीत में नक्सलवाद के आरोप को पूरी तरह गलत बताया. उन्होंने कहा,’सहिया असल में एक खूबसूरत लव स्टोरी है, जो नक्सलवाद और पुलिस के संघर्ष के बीच फंसे एक आदिवासी के प्यार की कहानी दिखाती है. फिल्म का मकसद नक्सलवाद को दिखाना या उसका समर्थन करना नहीं है, बल्कि फिल्म में एक आम आदमी नक्सली से चीख-चीखकर कहता है कि हिंसा किसी समस्या का समाधान नहीं है. पूरी फिल्म का आधार प्यार और इंसानी रिश्ते हैं, इसलिए इसे नक्सलवाद से जोड़ना मेरी समझ से परे है.’
प्रोड्यूसर ने कहा, ‘फिल्म की शूटिंग छत्तीसगढ़ के जंगलों और आदिवासी इलाकों में की गई है. मैंने जानबूझकर फिल्म को वास्तविक लोकेशन पर शूट किया ताकि कहानी बनावटी न लगे. अगर फिल्म में जंगल, झरने, नदियां और आदिवासी लोगों के घर दिखाए जा रहे हैं तो उसके लिए असली लोकेशन का इस्तेमाल करना जरूरी था. अब मुझे लगता है कि यही लोकेशन फिल्म के लिए परेशानी की वजह बन गई है. अगर कोई फिल्ममेकर आदिवासी इलाकों में जाकर वहां के लोगों और उनकी जिंदगी को समझते हुए फिल्म बनाता है तो उसे प्रेरित किया जाना चाहिए, न कि उसकी फिल्म को इसी वजह से शक की नजर से देखा जाना चाहिए.’
अधिकारी की बात सुनकर हैरान थे संजय शर्मा
संजय शर्मा ने सेंसर बोर्ड से जुड़े एक सीनियर अधिकारी के साथ हुई बातचीत का भी जिक्र किया. उन्होंने बताया कि एक अधिकारी ने उनसे कहा था कि अगर फिल्म की शूटिंग उत्तर प्रदेश में हुई होती तो वह इस समय फिल्म को सर्टिफिकेट दे देते. उन्होंने कहा, ‘यह बात सुनकर मैं हैरान रह गया. अगर कहानी और फिल्म वही है लेकिन सिर्फ शूटिंग की जगह बदल जाने से फिल्म का मतलब कैसे बदल सकता है? उत्तर प्रदेश में शूट करने पर फिल्म में नक्सलवाद नजर नहीं आता लेकिन झारखंड या छत्तीसगढ़ जैसे आदिवासी और कभी नक्सल प्रभावित इलाकों में शूट करने की वजह से उसी फिल्म पर सवाल उठता है, तो यह सोचने वाली बात है. मुझे इस बात की चिंता है कि कहीं ऐसी सोच की वजह से आदिवासी इलाकों को फिल्मों की शूटिंग से ही दूर न कर दिया जाए.’
सर्टिफिकेशन में देरी से हुई मुश्किल
प्रोड्यूसर ने रिव्यू कमेटी की प्रक्रिया में हुई देरी पर भी सवाल उठाए. उन्होंने कहा, ‘मेरी फिल्म को रिव्यू कमिटी के सामने पांच दिनों के भीतर दिखाया जाना था लेकिन फिल्म करीब 21 दिनों बाद देखी गई. रीजनल सिनेमा से जुड़े कलाकारों और प्रोड्यूसर्स के लिए इस तरह की देरी बड़ी परेशानी पैदा करती है. फिल्म बनाने में पैसा लगता है, कलाकारों और पूरी टीम की मेहनत लगती है और रिलीज की योजना बनाई जाती है, लेकिन सर्टिफिकेशन में देरी होने से पूरा सिस्टम प्रभावित होता है.’
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अभिषेक नागर \’न्यूज18 डिजिटल\’ में सीनियर सब एडिटर के पद पर काम कर रहे हैं. दिल्ली के रहने वाले अभिषेक नागर \’न्यूज18 डिजिटल\’ की एंटरटेनमेंट टीम का हिस्सा हैं. उन्होंने एंटरटेनमेंट बीट के अलावा करियर, हेल्थ और…
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