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हबीब तनवीर ने ऐसे समय में रंगमंच में अपनी पहचान बनाई, जब थिएटर की दुनिया में पढ़े-लिखे कलाकारों को ज्यादा महत्व दिया जाता था. तनवीर ने इस सोच से अलग रास्ता चुना. वह गांवों और छोटे इलाकों में काम करने वाले लोक कलाकारों को अपने नाटकों में लेकर आए. शुरुआत में वह इन कलाकारों को अपनी सीखी हुई थिएटर तकनीक सिखाना चाहते थे, लेकिन धीरे-धीरे उन्हें समझ आया कि इन कलाकारों को सिखाने से ज्यादा जरूरी है, उनसे सीखना. यही एहसास आगे चलकर उनके थिएटर की सबसे बड़ी पहचान बन गया.
हबीब तनवीर थियेटर का बड़ा नाम थे. (फोटो साभार: IANS)
नई दिल्ली: हबीब तनवीर का असली नाम हबीब अहमद खान था. पढ़ाई के बाद उनका रुझान साहित्य, कविता और थिएटर की तरफ बढ़ा. वह मुंबई भी गए, जहां उनका जुड़ाव इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन (इप्टा) से हुआ. इसी दौरान उन्होंने थिएटर को सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि आम लोगों की आवाज के तौर पर देखना शुरू किया. बाद में वह दिल्ली गए और वहां भी थिएटर से जुड़े कई अहम लोगों के साथ काम किया. उनका जन्म 1 सितंबर 1923 को रायपुर में हुआ था. आइए, खास मौके पर उनकी जिंदगी को करीब से जानें.
हबीब तनवीर ने आगे थिएटर की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड का रुख किया. उन्होंने रॉयल एकेडमी ऑफ ड्रामेटिक आर्ट्स में अभिनय की ट्रेनिंग ली और ब्रिस्टल ओल्ड विक थिएटर स्कूल में निर्देशन और प्रोडक्शन की पढ़ाई की. उन्होंने विदेश में वेस्टर्न थिएटर की तकनीकें सीखीं और ब्रेख्त के काम से भी प्रभावित हुए. भारत लौटने के बाद उन्होंने भारतीय लोक परंपराओं को अपने रंगमंच का आधार बनाया.
यहीं से हबीब की जिंदगी का वह मोड़ आया, जिसने उन्हें बाकी रंगकर्मियों से अलग कर दिया. तनवीर ने छत्तीसगढ़ के लोक कलाकारों के साथ काम करना शुरू किया. शुरुआत में वह उन्हें बताते थे कि मंच पर कहां खड़ा होना है, कैसे चलना है और किस तरह लाइन्स बोलना है. लेकिन कई कलाकार उनकी बताई हुई शैली में अभिनय नहीं कर पा रहे थे. इसके बाद, तनवीर को समझ आया कि समस्या कलाकारों में नहीं, बल्कि उनके अपने नजरिए में है. इन कलाकारों के पास किताबों से सीखी हुई एक्टिंग नहीं थी, लेकिन उनके पास लोक जीवन का अनुभव, अपनी भाषा, संगीत और सहज अभिनय था.
नया थिएटर की शुरुआत की
तनवीर ने उन्हें बदलने के बजाय उनकी इसी सहज शैली को मंच पर जगह देना शुरू किया. इस बदलाव का असर उनके नाटकों में साफ दिखाई दिया. उन्होंने लोक कलाकारों को शहरी और पढ़े-लिखे कलाकारों के साथ मंच पर उतारा. 1954 का ‘आगरा बाजार’ इसका बड़ा उदाहरण था. इस नाटक में उन्होंने आम बाजार, आम लोगों और शायर नजीर अकबराबादी की दुनिया को मंच पर उतारा. यह पारंपरिक थिएटर से काफी अलग था. बाद में 1959 में उन्होंने भोपाल में नया थिएटर की स्थापना की और छत्तीसगढ़ी लोक कलाकारों के साथ लगातार काम किया.
‘चरनदास चोर’ ने बनाया पॉपुलर
हबीब के इसी प्रयोग से ‘चरनदास चोर’, ‘मिट्टी की गाड़ी’, ‘गांव के नांव ससुराल, मोर नांव दमाद’, ‘बहादुर कलारिन’ और ‘जिस लाहौर नइ देख्या, ओ जम्याई नइ’ जैसे चर्चित नाटक सामने आए. ‘चरनदास चोर’ आगे चलकर उनकी सबसे मशहूर कृतियों में शामिल हुआ. 1982 में इसके मंचन को एडिनबर्ग इंटरनेशनल ड्रामा फेस्टिवल में फ्रिंज फर्स्ट पुरस्कार मिला. हबीब तनवीर को उनके काम के लिए संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, जवाहरलाल नेहरू फेलोशिप, पद्म श्री और पद्म भूषण जैसे सम्मान मिले. 1990 में उन्हें कालिदास सम्मान और 1996 में संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप भी मिली. 2002 में उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया गया. तनवीर ने फिल्मों में भी अभिनय किया. वह ‘गांधी’ और ‘प्रहार’ जैसी फिल्मों में नजर आए, लेकिन उनकी सबसे बड़ी पहचान हमेशा थिएटर ही रही. 8 जून 2009 को 85 साल की उम्र में उनका निधन हो गया.
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अभिषेक नागर \’न्यूज18 डिजिटल\’ में सीनियर सब एडिटर के पद पर काम कर रहे हैं. दिल्ली के रहने वाले अभिषेक नागर \’न्यूज18 डिजिटल\’ की एंटरटेनमेंट टीम का हिस्सा हैं. उन्होंने एंटरटेनमेंट बीट के अलावा करियर, हेल्थ और…
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