नई दिल्ली. ‘केजीएफ चैप्टर 2’ की जबरदस्त सफलता के बाद, यश ने कोई भी प्रोजेक्ट साइन करने में जल्दबाजी नहीं की. उन्हें इंडियन सिनेमा के सबसे बड़े पैन-इंडिया स्टार्स में से एक के तौर पर अपनी इमेज पक्की करने में चार साल लग गए. हालांकि, चार साल का गैप किसी भी सुपरस्टार के लिए दोधारी तलवार होता है. स्क्रीन से इस लंबी गैरमौजूदगी ने दर्शकों के बीच उम्मीदों का पहाड़ खड़ा कर दिया, जिसे सिर्फ एक हिट पूरी नहीं कर सकती थी. दर्शक सिर्फ एक सिनेमैटिक कहानी देखने के लिए थिएटर नहीं आए, बल्कि ‘रॉकी भाई’ के शानदार बड़े जादू को फिर से जीने आए. जब ’टॉक्सिक’ थिएटर में आई, तो उस लंबे चार साल के इंतजार का बोझ इसके स्क्रीनप्ले में साफ दिख रहा था.
‘केजीएफ’ का हैंगओवर
यश के लिए सबसे बड़ी चुनौती हमेशा यह रही है कि ‘रॉकी भाई’ के आइकॉनिक और बड़े किरदार से कैसे बाहर निकला जाए. ‘टॉक्सिक’ के प्रमोशन के दौरान इसे एक डार्क, हिंसक और नए जमाने की सिनेमा के तौर पर पेश किया गया था. डायरेक्टर गीतू मोहनदास का एक्सपेरिमेंट कागज पर बहुत अच्छा लग रहा था, लेकिन इसे करते समय फिल्म दो अलग-अलग नावों पर सवार लग रही थी. एक तरफ इसने यश की बनी-बनाई ‘मास-स्टार’ इमेज और स्वैग का फायदा उठाने की कोशिश की, जबकि दूसरी तरफ यह एक डार्क और एक्सपेरिमेंटल साइकोलॉजिकल थ्रिलर बनने की कोशिश कर रही थी. इस उलटी बात ने फिल्म के पूरे टोन को अनिश्चित बना दिया, जिससे दर्शक पूरी तरह कन्फ्यूज हो गए.
किसी फिल्म को बॉक्स ऑफिस पर अमर बनाने वाला उसका इमोशनल कनेक्शन होता है. ‘केजीएफ’ में रॉकी का अपनी मां से किया वादा पूरी हिंसक कहानी की आत्मा थी, जिसने हर तरह के दर्शकों के दिलों को छुआ. लेकिन ‘टॉक्सिक’ में डायरेक्टर का फोकस सिर्फ VFX, स्टाइलिश सिनेमैटोग्राफी, डार्क टोन और बैकग्राउंड स्कोर पर था. हालांकि फिल्म टेक्निकली रिच और पॉलिश्ड लगती है, लेकिन इसकी स्क्रिप्ट में वह इमोशनल गहराई और पकड़ नहीं थी जो दर्शकों को अपनी सीटों से बांधे रखती है. यश का स्वैग स्क्रीन पर साफ था, लेकिन कहानी इतनी बिखरी हुई थी कि दर्शक उनके किरदार से जुड़ नहीं पाए.
लोकल फ्लेवर का खत्म होना
‘केजीएफ’ की सबसे बड़ी ताकत अपनी जड़ों के प्रति उसका अटूट कमिटमेंट था. यह कन्नड़ सिनेमा का मिट्टी से जुड़ा फ्लेवर और रीजनल अपील ही थी जिसने बाद में इंटरनेशनल लेवल पर सनसनी मचा दी. इसके उलट ‘टॉक्सिक’ ने शुरू से ही एक बहुत ज्यादा बड़ा ‘ग्लोबल’ नजरिया थोपने की कोशिश की. देश और विदेश, दोनों जगह अलग-अलग भाषाओं के एक्टर्स को जबरदस्ती इकट्ठा करके और वेस्टर्न सिनेमा की तरह एक मुश्किल ‘डार्क दुनिया’ बनाकर, इस फिल्म ने अपनी इंडियन मास अपील और देसी स्वाद खो दिया. जो फिल्में एक ही समय में सभी भाषाओं और इलाकों के दर्शकों को अपील करने की कोशिश करती हैं, वे अक्सर किसी भी हिस्से तक पूरी तरह से नहीं पहुंच पातीं और ‘टॉक्सिक’ के साथ भी ठीक यही हुआ.
स्टार्स के लिए सबसे बड़ा सबक
‘टॉक्सिक’ का फेल होना सिर्फ एक फिल्म या एक एक्टर के लिए झटका नहीं है, बल्कि आज पूरी पैन-इंडिया फिल्म इंडस्ट्री के लिए एक गहरा सबक है. यह इस कड़वी सच्चाई को दिखाता है कि सिर्फ 500 करोड़ का भारी बजट, एक स्टाइलिश टीजर और सालों का सस्पेंस किसी फिल्म की सफलता की गारंटी नहीं दे सकता. अगर स्क्रिप्ट में दम नहीं है और दर्शक किरदारों से जुड़ नहीं पाते, तो सबसे बड़ा स्टारडम भी किसी फिल्म को फेल होने से नहीं बचा सकता. यश बेशक इस पीढ़ी के सबसे होनहार और टैलेंटेड एक्टर्स में से एक हैं, लेकिन ‘टॉक्सिक’ उनके करियर में एक टर्निंग प्वाइंट बन गई है, जो उन्हें हमेशा याद दिलाएगी कि स्टारडम से भी बड़ी और मजबूत कहानी हमेशा होती है. बता दें, फिल्म ‘टॉक्सिक’ ने पहले दिन वर्ल्डवाइड 140 करोड़ की कमाई कर तहलका मचा दिया था, लेकिन दूसरे दिन से ही इसकी कमाई में भारी गिरावट दिखाई दी. 26 अगस्त को सिनेमाघरों में रिलीज हुई इस फिल्म के हाथ वर्ल्डवाइड ग्रॉस अभी तक 300 करोड़ लगे हैं.










