नई दिल्ली. स्वरा भास्कर जी, आपने फिल्म इंडस्ट्री में एक को-एक्ट्रेस के तौर पर लगभग 13 साल काम किया है, जबकि मैं पिछले 14 सालों से जर्नलिज्म में हूं और 10 साल से ज्यादा समय से फिल्मी खबरों में गहराई से शामिल हूं. आपने अपने करियर में 15 से 16 फिल्मों में एक्टिंग की है. दर्शकों ने ‘तनु वेड्स मनु’, ‘रांझणा’ और ‘निल बटे सन्नाटा’ जैसी फिल्मों में को-एक्ट्रेस के तौर पर आपके काम को बहुत पसंद किया. उस समय ऐसा लगा कि आप सिर्फ अपनी एक्टिंग के दम पर बॉलीवुड में अपनी एक मजबूत जगह बना लेंगी. हालांकि, जब आपको लीड रोल करने का मौका मिला, तो दर्शक आपसे उस तरह कनेक्ट नहीं हुए जैसे वे किसी जानी-मानी A-लिस्टेड एक्ट्रेस से कनेक्ट करते हैं. अगर आप 90 के दशक और आज की बॉलीवुड की A-लिस्टेड एक्ट्रेस को देखें, तो आप पाएंगे कि उन्होंने अपने काम को प्रायोरिटी दी और समय के साथ अपनी रेलिवेंस बनाए रखी. आपके मामले में, जहां आपकी अच्छी फिल्मों ने आपका फैन बेस बढ़ाया, वहीं गैर-जरूरी और कॉन्ट्रोवर्शियल बयानों ने धीरे-धीरे उस फैन बेस को दूर कर दिया. ऐसा लगता है कि छोटी सोच और लाइमलाइट में बने रहने की चाहत ने आपके करियर को वो ऊंचाई नहीं दी जिसका वो हकदार था.
एक आर्टिस्ट या को-आर्टिस्ट होने से आपको एक सोशल पहचान मिलती है. भले ही आपका फैन बेस लिमिटेड हो, लोग आपकी बात सुनते हैं. इसलिए, पब्लिक प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल कैसे किया जाना चाहिए, यह सोचने लायक एक सीरियस सवाल है. जब भी आपको किसी बड़े प्लेटफॉर्म पर बोलने का मौका मिले, तो वहां से जो मैसेज निकले, उसका मकसद सिर्फ कॉन्ट्रोवर्सी पैदा करना नहीं होना चाहिए. फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन का मतलब जिम्मेदारी से भागना नहीं है. समाज को गाइड करने के लिए, खासकर महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए आवाज उठाते समय, उनके पास एक मैच्योर विजन होना चाहिए. मैंने आपकी तरफ से ऐसी कोई फिल्म या ठोस पहल नहीं देखी, जिसने समाज को कोई बड़ा पॉजिटिव मैसेज दिया हो. इसलिए, जब कोई प्लेटफॉर्म दिया जाए, तो विवादित कमेंट्स के बजाय काम के मुद्दों पर ध्यान देना ज्यादा जरूरी है.
जब हम ‘महिलाएं, जिंदगी और आजादी’ जैसे जरूरी टॉपिक पर बात करते हैं, तो उन प्रैक्टिकल चुनौतियों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए जिनका सामना आम महिलाएं हर दिन करती हैं. सिर्फ ऐतिहासिक फिल्मों के सीन की अलग तरह से आलोचना करने से महिलाओं की असली समस्याओं का हल नहीं होगा. प्लेटफॉर्म का सही और सच्चा इस्तेमाल तब होगा जब वे महिलाओं के लिए अच्छी शिक्षा, उनके लिए रोजगार के नए मौके बनाने, काम की जगह पर सुरक्षा, आर्थिक आजादी और सुरक्षित भविष्य पर गंभीर चर्चा करेंगे. अगर आप, एक महिला के तौर पर महिला सशक्तिकरण को सपोर्ट करना चाहती हैं, तो जमीनी स्तर के मुद्दों पर बोलें जो सच में किसी की जिंदगी में अच्छा बदलाव ला सकते हैं.
आखिर में, इस ओपन लेटर के जरिए एक जर्नलिस्ट और एक दर्शक के तौर पर मेरी आपसे यही उम्मीद है कि आप अपना दायरा बढ़ाएंगे. किसी आर्टिस्ट का कद सिर्फ उनकी बनाई फिल्मों की संख्या से तय नहीं होता, बल्कि उनके विचारों की मैच्योरिटी और समाज को देखने के उनके नजरिए से तय होता है. उम्मीद है, जब भी आपको भविष्य में किसी नेशनल या इंटरनेशनल प्लेटफॉर्म पर अपने विचार बताने का मौका मिलेगा, तो आप उन्हें एक मैच्योर ‘लीड’ के तौर पर पेश करेंगे, न कि सिर्फ एक को-एक्ट्रेस के डिफेंसिव और कॉन्ट्रोवर्शियल नजरिए से. कॉन्ट्रोवर्सी पैदा करने के बजाय आपके विचार समाज और महिलाओं के फायदे के लिए एक पॉजिटिव बातचीत शुरू करेंगे.
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi उत्तरदायी नहीं है.)
















