पीड़िता जिस मानसिक अवसाद और अंधकार से गुजर रही है, उससे उबर पाना अकल्पनीय है। मां-बेटी के साथ हुआ कृत्य किसी भी व्यक्ति के लिए मृत्यु के समान पीड़ादायक है।
न्यायालय ने केंद्र और राज्य सरकारों की ओर से चलाए जा रहे ”बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” अभियान का संदर्भ देते हुए कहा कि यदि ऐसे आदिम व बर्बर अपराधों के खिलाफ कठोर रुख नहीं अपनाया गया तो ये अभियान कागजी बनकर रह जाएंगे। सख्त लहजे में कहा कि न्याय प्रणाली ने समाज की चीख-पुकार को नहीं सुना तो जनता का विश्वास उठ जाएगा।
यह भी कहा कि भयमुक्त समाज का निर्माण तभी संभव है, जब अपराधियों में कानून का खौफ हो। दोषियों का अपराध न केवल घृणित है, बल्कि इंसानियत के वजूद को चुनौती देने वाला है। समाज में असुरक्षा और असहजता का भाव उत्पन्न करने वाले ऐसे अपराधियों के साथ किसी भी प्रकार की नरमी न्यायसंगत नहीं होगी।
फैसले के दौरान न्यायालय ने दोषियों के आपराधिक इतिहास और अपराध की प्रकृति को ध्यान में रखते हुए कहा कि उन्होंने निर्दयता व कायरता की सारी हदें पार कर दीं। हैवानियत की इस पराकाष्ठा के चलते दोषियों को सभ्य समाज का हिस्सा बने रहने का कोई अधिकार नहीं है। इसी आधार पर न्यायालय ने उन्हें सजा सुनाते हुए समाज को कड़ा संदेश दिया।
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