जिले के ब्लॉक सदर, मनिहारी व देवकली के बहादीपुर, हरिहरपुर, हाला, शिकारपुर, धारीकला, तारडीह, भौरहा, बुढ़नपुर, राठौली सराय, खिजीरपुर और खुटहन गांव में यह बीमारी करीब 15 साल पुरानी है। मंगलवार को संवाद न्यूज एजेंसी की टीम बहादीपुर, हाला, हरिहरपुर और चौहान बस्ती पहुंची और पीड़ितों का दर्द जाना।
पड़ोस की पुनसा देवी ने बताया पोती सोनी जब दो साल की थी, तब बुखार आया था। इसके बाद उसके दोनों पैर सूख गए। परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है। सोनी के पिता राम विलास और मां मीरा ईंट-भट्ठे पर काम करते हैं। कुछ दूरी पर रहने वाली गायत्री बताती हैं, उनके पांच बच्चे हैं, दो पुत्र और तीन पुत्रियां। सलोनी तीसरे नंबर पर है। करीब पांच वर्ष की उम्र में उसे बुखार आया था। वाराणसी उपचार कराने ले गई, मगर फायदा नहीं मिला। इलाज पर तीन लाख रुपये खर्च हो गए। सलोनी की तकलीफ को बयां करते-करते उनकी आंखें भर आईं।
गाजीपुर, लखनऊ, वाराणसी ही नहीं उत्तराखंड तक कराया उपचार
हरिहरपुर गांव से कुछ दूरी पर हरिहरपुर चौहान बस्ती है। यहां दो बहनें प्रिया और परिधि भी दिव्यांगता का दंश झेल रही हैं। मां सुभावती देवी कहती हैं कि तीन बच्चे हैं, पुत्र बड़ा है और दोनों बेटियां छोटी हैं, लेकिन कुछ बोल नहीं पाती हैं, मानसिक रूप से कमजोर हो चुकी हैं। चिकित्सक कहते हैं कि ठीक हो जाएगी लेकिन कब ये पता नहीं। बच्चियों का गाजीपुर से लेकर वाराणसी, लखनऊ और उत्तराखंड तक उपचार कराया। वर्तमान में वाराणसी में दोनों बच्चियों का उपचार चल रहा है। पहले झटका बार-बार आता था। अब माह के एक-दो बार आ रहा है। इसी तरह रमिता देवी, गायत्री देवी और पुनसा ने बताया कि वह अपने बच्चों को इलाज कराते कराते थक चुकी हैं।
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