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करीब तीन दशक पहले ‘बॉर्डर’ सिनेमाघरों में आई और ऑडियंस को अट्रैक्ट कर दिया. हर कोई सनी देओल की गरजती आवाज, जबरदस्त वॉर के सीन और अन्य किरदारों की दोस्ती को याद करता है. लेकिन एक ऐसी मौजूदगी थी, जो चुपचाप लोगों के दिलों में बस गई, एक सधी हुई अदाकारा जिसने कहानी को गहराई दी, जिसमें इंतजार, प्यार और खोने की भावना थी.
‘बॉर्डर’ में वॉर सीन से आगे, एक अदाकारा की मौजूदगी ऑडियंस के साथ आखिरी फ्रेम के बाद भी बनी रही. धमाकों और जंग के बीच, उन्होंने अपने किरदार के जरिए एक ऐसी छाप छोड़ी, जो उन महिलाओं की मजबूती को दिखाती है, जो अपने पति के युद्ध में लौटने का इंतजार करती हैं. स्क्रीन पर कम समय के बावजूद, उनका असर गहरा था. क्या आप पहचान सकते हैं कि वो कौन हैं? (फोटो साभारः इंस्टाग्राम)

वो एक्ट्रेस कोई और नहीं, बल्कि शरबानी मुखर्जी हैं. उन्होंने फिल्म में फूलवती का किरदार निभाया था, जो सुनील शेट्टी के किरदार की पत्नी थीं. उनका स्क्रीन टाइम कम था, लेकिन उनकी फीलिंग्स से भरी आंखें और सधी हुई अदाकारी ने दर्शकों पर गहरी छाप छोड़ी. पुरुष प्रधान फिल्म में उन्होंने इमोशनल सेंटर की भूमिका निभाई, जिसमें उन्होंने बिना आवाज उठाए इंतजार, प्यार और खोने की भावना को जिया. (फोटो साभारः इंस्टाग्राम@sharbanimukherji)

शरबानी मुखर्जी मशहूर फिल्मी परिवार से आती हैं. वो काजोल और रानी मुखर्जी की कजिन हैं, उनके पिता आपस में भाई हैं. जब शरबानी ने 1997 में ‘बॉर्डर’ से डेब्यू किया, तब काजोल स्टार थीं, जबकि रानी ने अपना सफर शुरू ही किया था. एक वक्त ऐसा लगा कि शरबानी अपने डेब्यू की सफलता के साथ स्टारडम की ओर बढ़ेंगी. लेकिन बॉलीवुड की अनिश्चितता ने उन्हें अलग राह पर डाल दिया. (फोटो साभारः इंस्टाग्राम@sharbanimukherji)
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जहां रानी मुखर्जी हिंदी सिनेमा की सबसे चर्चित एक्ट्रेसेज में शुमार हो गईं, वहीं शरबानी का सफर शांत रहा और उन्हें ज्यादा मौके नहीं मिले. ‘बॉर्डर’ के बाद उन्होंने समीर सोनी के साथ म्यूजिक वीडियो ‘घर आजा सोनिया’ में काम किया, जो काफी लोकप्रिय हुआ. उन्होंने ‘मिट्टी’, ‘अंश’, ‘कैसे कहूं के… प्यार है’ और ‘अनजाने’ जैसी फिल्मों में भी काम किया, लेकिन कोई भी फिल्म उन्हें लीडिंग स्टार नहीं बना सकी. उनकी प्रतिभा साफ थी, लेकिन सही मौका नहीं मिला. (फाइल फोटो )

यहां तक कि अच्छे प्रोजेक्ट्स भी शरबानी मुखर्जी के डेब्यू की जादू को दोहरा नहीं सके. उन्होंने भोजपुरी सिनेमा में भी किस्मत आजमाई, फिल्म ‘धरती कहे पुकार के’ में अजय देवगन और मनोज तिवारी के साथ नजर आईं. फिल्म ने कमर्शियल तौर पर अच्छा किया, लेकिन शरबानी ने इंडस्ट्री में आगे काम नहीं किया, जिससे उनके फैंस हैरान रह गए. भोजपुरी इंडस्ट्री से उनकी दूरी एक पैटर्न की तरह दिखी, हालांकि मौके उनके पास आते रहे. (फोटो साभारः इंस्टाग्राम @sharbanimukherji)

शरबानी मुखर्जी को असली पहचान मलयालम सिनेमा में मिली. ‘बॉर्डर’ के करीब 12 साल बाद उनकी दूसरी मलयालम फिल्म ‘सूफी परांजा कथा’ (2010) ने उन्हें खूब सराहना दिलाई. इसमें उन्होंने कार्थी का किरदार निभाया, जो धार्मिक सीमाओं को पार कर भाग जाती है. शरबानी की बारीक अदाकारी को आखिरकार वो पहचान मिली, जिसकी वो हकदार थीं. (फोटो साभारः इंस्टाग्राम @sharbanimukherji)

विडंबना यह रही कि पहचान मिलने के इसी दौर में शरबानी मुखर्जी ने फिल्मों से दूरी बना ली. उनकी आखिरी फिल्म ‘आत्मकथा’ थी, जिसने उनके फिल्मी सफर का शांत अंत किया. कई कलाकारों के उलट, उन्होंने बिना किसी शोर-शराबे, विवाद या सार्वजनिक घोषणा के इंडस्ट्री को अलविदा कह दिया, जिससे लोग उन्हें उनकी सीमित लेकिन शानदार अदाकारी के लिए याद करते हैं, न कि हिट फिल्मों की लंबी लिस्ट के लिए. (फोटो साभारः इंस्टाग्राम @sharbanimukherji)

आज शरबानी मुखर्जी लाइमलाइट से दूर रहती हैं. वो परिवार के आयोजनों में नजर आती हैं, खासकर मुखर्जी परिवार की दुर्गा पूजा में, जो उस दौर की याद दिलाता है जब उन्होंने दिलों को छू लिया था. उनके करियर के बारे में फिलहाल कोई सटीक जानकारी उपलब्ध नहीं है. (फोटो साभारः इंस्टाग्राम @sharbanimukherji)
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