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माघ मेले से जुड़े विवादों के बीच महामंडलेश्वर ममता कुलकर्णी का बड़ा बयान सामने आया है. उन्होंने शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती विवाद पर अपना रिएक्शन दिया है. वो कहती हैं कि अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का रवैया अहंकार और अज्ञानता से भरा हुआ है. कानून की नजर में सब एक हैं. कानून के सामने क्या राजा और क्या रंक, सबको एक ही नजर से देखा जाना चाहिए.
नई दिल्ली. प्रयागराज में चल रहा माघ मेला इन दिनों केवल अपने धार्मिक महत्व के कारण ही नहीं, बल्कि विवादों और तीखे बयानों को लेकर भी लगातार चर्चा में बना हुआ है. साधु-संतों के आचरण, परंपराओं और अधिकारों को लेकर उठ रहे सवालों के बीच किन्नर अखाड़े की महामंडलेश्वर ममता कुलकर्णी भी अब इस विवाद से अछूत नहीं हैं. ममता कुलकर्णी ने इस बार माघ मेला में अपनी अनुपस्थिति पर चुप्पी तोड़ते हुए कहा कि वो गुप्त नवरात्री की वजह से माघ मेला में नहीं जा पाईं. इसके साथ ही पूर्व बॉलीवुड एक्ट्रेस ममता कुलकर्णी ने अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती विवाद पर भी अपना तीखा रिएक्शन दिया.
माघ मेले में शामिल न होने को लेकर ममता कुलकर्णी ने कहा कि उनका जीवन अब पूरी तरह साधना और तपस्या को समर्पित है. उन्होंने बताया, ‘मैं पिछले 25 वर्षों से निरंतर तप कर रही हूं. रोजाना गंगा जल से स्नान करने के बाद ही पूजा-पाठ करती हूं. फिलहाल गुप्त नवरात्र चल रही हैं और नवरात्र के समय मैं कहीं बाहर नहीं जाती. इसी कारण मैं माघ मेले में नहीं पहुंच पाई.’
शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती विवाद पर ममता ने क्या कहा?
इंटरव्यू के दौरान जब उनसे माघ मेले में पालकी रोके जाने के विरोध में ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के धरने को लेकर सवाल किया गया, तो ममता कुलकर्णी ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया दी. उन्होंने कहा कि इस पूरे मामले में शंकराचार्य के फैसले की वजह से उनके शिष्यों को नुकसान उठाना पड़ा. उनके अनुसार, ‘अगर स्नान करना ही था, तो पालकी से उतरकर पैदल भी संगम तक जाया जा सकता था. गुरु होने का अर्थ जिम्मेदारी और संयम होता है, न कि ऐसी जिद, जिसकी कीमत शिष्यों को चुकानी पड़े’.
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती पर ममता कुलकर्णी ने उठाए सवाल
ममता कुलकर्णी ने आगे कहा कि कानून सभी के लिए समान है, चाहे वह राजा हो या सामान्य व्यक्ति, गुरु हो या शिष्य. उन्होंने टिप्पणी करते हुए कहा कि केवल चारों वेद कंठस्थ कर लेने से कोई शंकराचार्य नहीं बन जाता. उनके मुताबिक, इस पूरे विवाद में अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का अहंकार साफ नजर आता है और आत्मज्ञान की कमी दिखाई देती है.
गौरतलब है कि 18 जनवरी को मौनी अमावस्या के दिन ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती पालकी में सवार होकर संगम स्नान के लिए निकले थे. उनके साथ करीब 200 शिष्य मौजूद थे. भारी भीड़ को देखते हुए मेला प्रशासन ने सुरक्षा कारणों से पालकी के साथ संगम तक जाने पर रोक लगा दी और पैदल स्नान करने की सलाह दी थी.प्रशासन का तर्क था कि पालकी के साथ आगे बढ़ने से भगदड़ की स्थिति बन सकती थी. हालांकि शंकराचार्य पालकी से ही संगम तक जाना चाहते थे, जिसको लेकर प्रशासन और शंकराचार्य पक्ष के बीच लगभग तीन घंटे तक बातचीत और तनाव की स्थिति बनी रही.
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प्रांजुल सिंह 3.5 साल से न्यूज18 हिंदी से जुड़ी हुई हैं. उन्होंने Manorama School Of Communication (MASCOM) से जर्नलिज्म और मास कम्यूनिकेशन में डिप्लोमा किया है. वो 2.5 साल से एंटरटेनमेंट डेस्क पर काम कर रही है…और पढ़ें
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