नई दिल्ली. कुछ फिल्में सिर्फ ‘हिट’ या ‘फ्लॉप’ के पैमाने पर नहीं मापी जातीं, बल्कि वे एक ‘बेंचमार्क’ बन जाती हैं. 2019 में, जब विक्की कौशल की फिल्म ‘उरी: द सर्जिकल स्ट्राइक’ रिलीज हुई तो किसी ने नहीं सोचा था कि एक नए डायरेक्टर (आदित्य धर) की यह फिल्म बॉलीवुड में ‘राष्ट्रवाद’ और ‘वॉर ड्रामा’ की एक नई लहर लाएगी. आइए समझते हैं कि उरी के बाद बॉलीवुड में क्या बदलाव आया.
‘रॉ’ और ‘हाइपर-रियलिस्टिक’
उरी की सबसे बड़ी सफलता उसकी टेक्नोलॉजी थी. फिल्म में इस्तेमाल किए गए ‘नाइट विजन कैमरे’, साइलेंसर वाली बंदूकों की आवाज और दिखाए गए रियलिस्टिक लड़ाई के सीन ने बॉलीवुड में एक्शन का स्टैंडर्ड बढ़ा दिया. अब दर्शक सिर्फ हवा में उड़ती कारें या रजनीकांत स्टाइल का एक्शन नहीं देखना चाहते थे. यही वजह है कि बाद की फिल्में जैसे ‘बाटला हाउस’, ‘मेजर’ और यहां तक कि ‘शेरशाह’, ‘पठान’ और ‘बॉर्डर 2’ ने भी इसी ‘रियलिस्टिक अप्रोच’ को अपनाया.
गुमनाम नायकों की कहानियों की बाढ़
उरी की सफलता ने फिल्ममेकर्स को यह भरोसा दिलाया कि जनता सिर्फ बड़े स्टार्स को नहीं, बल्कि दमदार कहानियों और ‘गुमनाम नायकों’ को देखना चाहती है. इसके बाद, बॉलीवुड में ऐतिहासिक और असल जिंदगी के नायकों पर बायोपिक बनाने का जबरदस्त ट्रेंड शुरू हुआ.
- शेरशाह: कैप्टन विक्रम बत्रा की कहानी.
- सरदार उधम: एक क्रांतिकारी की अनकही कहानी.
- सैम बहादुर: फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ का गौरवशाली इतिहास.
- मेजर: संदीप उन्नीकृष्णन का बलिदान.
फिल्ममेकर अब धूल भरी ऐतिहासिक फाइलों को खंगाल रहे हैं ताकि ऐसे हीरो मिल सकें जिनके नाम तो जाने-पहचाने हैं, लेकिन उनके कामों को दिखाया नहीं गया है.
इंटेलिजेंस और जासूसी यूनिवर्स का विस्तार
उरी ने दिखाया कि आधुनिक युद्ध सिर्फ बंदूकों से नहीं, बल्कि ‘इंटेलिजेंस’ और ‘डेटा’ से जीते जाते हैं. इस ट्रेंड को यश राज फिल्म्स ने ‘पठान’ और ‘टाइगर 3’ से, और सिद्धार्थ आनंद ने ‘फाइटर’ से भुनाया. अब, बॉलीवुड में एक पूरा ‘जासूसी यूनिवर्स’ बन गया है. दर्शक अब स्क्रीन पर रॉ एजेंट, स्पेशल फोर्सेज और हाई-टेक गैजेट देखना पसंद करते हैं.
बॉक्स ऑफिस के लिए नया ‘गोल्डन फॉर्मूला’
उरी ने साबित किया कि ‘खान’ या ‘कपूर’ सरनेम के बिना भी 300 करोड़ की फिल्म बनाई जा सकती है, बशर्ते वह राष्ट्रवाद की सही भावनाओं को छूए. इस फिल्म के बाद, देशभक्ति सिर्फ स्वतंत्रता दिवस या गणतंत्र दिवस तक सीमित नहीं रही, बल्कि एक सफल कमर्शियल फॉर्मूला बन गई जो पूरे साल काम करता है. आज, अक्षय कुमार से लेकर अजय देवगन तक हर बड़ा स्टार इस जॉनर में हाथ आजमाना चाहता है क्योंकि इसमें रिस्क कम है और ‘रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट’ ज्यादा है.
जहां उरी ने क्वालिटी के मामले में स्टैंडर्ड बढ़ाया, वहीं इसके बाद कई ऐसी फिल्में आईं जिन्होंने सिर्फ ‘राष्ट्रवाद’ के नाम पर कमजोर कहानियों को बेचने की कोशिश की. हालांकि, दर्शकों की समझदारी काम आई, और उन्होंने सिर्फ उन्हीं फिल्मों को सफल बनाया जिन्होंने भावनाओं को बेहतरीन फिल्म मेकिंग के साथ जोड़ा.
क्या ‘बॉर्डर 2’ इस विरासत को आगे बढ़ा पाएगी?
आज, जब हम ‘बॉर्डर 2’ को देखते हैं, तो ‘उरी’ का प्रभाव साफ दिखता है. जहां 1997 की बॉर्डर सिर्फ सेना की कहानी थी, वहीं ‘बॉर्डर 2’ में नेवी और एयर फोर्स का तालमेल उसी रणनीतिक फिल्म मेकिंग की याद दिलाता है जो ‘उरी’ में देखी गई थी. उरी ने बॉलीवुड को सिखाया कि देशभक्ति सिर्फ रोने-धोने के बारे में नहीं है, बल्कि ‘जोश’ के बारे में है. इसने भारतीय सिनेमा को टेक्नोलॉजी और कंटेंट के मामले में ग्लोबल स्टेज पर खड़े होने का साहस दिया. बॉलीवुड अब एक ऐसे दौर में है जहां वह अपनी मिट्टी से जुड़ी कहानियों को मॉडर्न फॉर्मेट में पेश कर रहा है, और मेरे विचार से इसका पूरा क्रेडिट ‘उरी’ द्वारा शुरू की गई क्रांति को जाना चाहिए है.
आदित्य धर का जलवा
इसमें कोई शक नहीं कि साल 2019 में ‘उरी: द सर्जिकल स्ट्राइक’ जैसी मास्टरपीस फिल्म देकर आदित्य धर ने पूरी दुनिया को चौंका दिया था, लेकिन पिछले साल रिलीज हुई उनकी अगली बड़ी फिल्म ‘धुरंधर’ ने यह साबित कर दिया कि आदित्य धर केवल ‘वन-फिल्म वंडर’ नहीं, बल्कि आधुनिक भारतीय सिनेमा के असली ‘धुरंधर’ खिलाड़ी हैं. ‘धुरंधर’ की रिलीज के बाद आदित्य धर ने एक बार फिर बॉक्स ऑफिस पर वो जादुई आंकड़ा छुआ, जिसकी उम्मीद केवल बड़े निर्देशकों से की जाती है. इस फिल्म में उन्होंने उरी वाले उस ‘स्ट्रैटेजिक नेशनलिज्म’ को एक नए और भव्य स्तर पर पहुंचाया. जहां उरी एक गुप्त ऑपरेशन की कहानी थी, वहीं ‘धुरंधर’ में आदित्य ने अंतरराष्ट्रीय स्तर की जासूसी और हाई-टेक एक्शन का ऐसा तालमेल बिठाया कि दर्शक दांतों तले उंगलियां दबाने पर मजबूर हो गए.










