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फिल्ममेकर ने साल 1923 में ग्वालियर में आर्य सुभोध नाटक मंडली की स्थापना की, जिसमें शेक्सपियर के नाटकों के उर्दू रूपांतरण पर फोकस गया. फिल्ममेकिंग के अलावा उन्हें एक्टिंग का भी शौक था. आखिरी वह हेमा मालिनी के साथ एक फिल्म में दिखे थे. वह आखिरी समय में आर्थिक तंगी से गुजर रहे थे. बोन मैरो कैंसर से 86 की उम्र में निधन हुआ था.
भारतीय सिनेमा में एक ऐसे फिल्मकार थे जिनकी सोच हमेशा भव्य रही और जिन्हें सिनेमा के दृश्य प्रभाव पर पूरा भरोसा था. उनकी फिल्में अपने ग्रैंड लेवेल, दमदार एक्टिंग और गंभीर विषयों के लिए जानी जाती थीं. अपने करियर के दौरान उन्होंने ऐतिहासिक एपिक फिल्में बनाईं, जिन पर शेक्सपियर और रंगमंच की परंपराओं का गहरा असर था. (फाइल फोटो)

इस फिल्मकार को सिनेमा में उनके योगदान के लिए राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दुर्लभ पहचान मिली. उनकी फिल्मों में भव्य सेट, डिसिप्लिन डायलॉग्स डिलीवरी और शक्ति, बलिदान और पहचान जैसे विषयों की गहराई से पड़ताल की गई. उन्हें देश के सर्वोच्च फिल्म सम्मान सहित कई पुरस्कार मिले और राजनीतिक नेताओं व आलोचकों ने खुले तौर पर उनके काम की सराहना की, क्योंकि उन्होंने इतिहास और साहित्य को फिर से जीवंत किया. (फाइल फोटो)

इन असाधारण फिल्मों के पीछे का नाम सोहराब मोदी था, जो भारतीय सिनेमा के शुरुआती दिग्गजों में से एक थे. एक्टर, डायरेक्टर, प्रोड्यूसर और स्टूडियो के फाउंडर के रूप में शोहराब मोदी ने वह मुकाम हासिल किया, जिसे उस दौर के लोग कोई नहीं छू सके. उनकी फिल्मों में पारसी थिएटर की बारीकी, शेक्सपियरियन ड्रामा और राष्ट्रवादी झलक मिलती थी, जिससे उनकी फिल्में सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक आयोजन बन जाती थीं. (फाइल फोटो)
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2 नवंबर 1897 को मुंबई में जन्मे सोहराब मोदी को सिनेमा से पहली बार जुड़ाव उनके भाई केकी मोदी के ट्रैवलिंग प्रोजेक्शन बिजनेस और ‘किस्मत’ सिनेमा के मालिक होने के कारण मिला. इन वर्षों ने दर्शकों की मनोविज्ञान और दृश्य कहानी कहने की उनकी समझ को आकार दिया और एक ऐसे करियर की नींव रखी, जिसने आगे चलकर तकनीकी और कहानी कहने की सीमाओं को आगे बढ़ाया. (फाइल फोटो)

फिल्मों में आने से पहले सोहराब मोदी ने पारसी थिएटर में कड़ी ट्रेनिंग ली, जहां संवाद, उच्चारण और नाटकीय मुद्रा को सबसे ज्यादा महत्व दिया जाता था. 1923 में उन्होंने ग्वालियर में आर्य सुभोध नाटक मंडली की स्थापना की, जिसमें शेक्सपियर के नाटकों के उर्दू रूपांतरण पर ध्यान केंद्रित किया गया. यही रंगमंच की पृष्ठभूमि बाद में उनकी फिल्मों की भाषा, लय और गंभीरता की पहचान बनी. (फाइल फोटो)

1931 में ‘आलम आरा’ के बाद जब भारत में बोलने वाली फिल्में आईं, तो मोदी ने जल्दी ही समझ लिया कि थिएटर का भविष्य अब सिनेमा में है. अपने भाई के साथ मिलकर उन्होंने स्टेज फिल्म कंपनी बनाई और ‘हैमलेट’ और ‘किंग जॉन’ को ‘खून का खून’ (1935) और ‘सईद-ए-हवस’ (1936) में रूपांतरित किया. भले ही ये फिल्में व्यावसायिक रूप से सफल नहीं रहीं, लेकिन इन्हीं से उन्हें फिल्म निर्माण की असली शिक्षा मिली. (फाइल फोटो)

1936 में सोहराब मोदी ने मिनर्वा मूवीटोन की स्थापना की, जो साधारण कहानी कहने को नकारता था. शुरुआती फिल्मों में ‘तलाक’ (1938) में महिलाओं के तलाक के अधिकार और ‘मीठा जहर’ (1938) में शराबखोरी जैसे सामाजिक मुद्दों को उठाया गया, जिससे साबित हुआ कि भव्यता और सामाजिक संदेश एक साथ चल सकते हैं. (फाइल फोटो)

अपने करियर के अंतिम चरण में उन्होंने कुछ ही फिल्में निर्देशित कीं, लेकिन अभिनय जारी रखा, जिसमें ‘रजिया सुल्तान’ (1983) में वज़ीर की भूमिका खास रही. जीवन के अंतिम समय में उन्हें आर्थिक तंगी और गिरती सेहत का सामना करना पड़ा. 1984 में 86 वर्ष की उम्र में बोन मैरो कैंसर के कारण उनका निधन हो गया, लेकिन वे अपने पीछे शानदार फिल्मों की विरासत छोड़ गए. (फाइल फोटो)
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