दिल्ली के लाल किले के पास हुए विस्फोट मामले की जांच में सुरक्षा एजेंसियों ने एक बेहद चौंकाने वाला खुलासा किया है। जांच में सामने आया है कि तथाकथित ‘व्हाइट-कॉलर’ आतंकी मॉड्यूल से जुड़े आरोपी, जिनमें उच्च शिक्षित डॉक्टर भी शामिल थे, पाकिस्तान में बैठे हैंडलरों से संपर्क बनाए रखने के लिए ‘घोस्ट सिम कार्ड’ और एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग एप्स का इस्तेमाल कर रहे थे।

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आरोपी शाहीन
– फोटो : एजेंसी
डुअल-फोन रणनीति से एजेंसियों को दिया चकमा
जांच अधिकारियों के मुताबिक, गिरफ्तार डॉक्टरों-मुजम्मिल गनई, आदिल राथर सहित अन्य ने सुरक्षा एजेंसियों से बचने के लिए एक सुनियोजित ‘डुअल-फोन प्रोटोकॉल’ अपनाया था। हर आरोपी के पास दो से तीन मोबाइल फोन होते थे। एक ‘क्लीन फोन’ उनके नाम से रजिस्टर्ड होता था, जिसका इस्तेमाल रोजमर्रा और पेशेवर कामों के लिए किया जाता था, जबकि दूसरा फोन सिर्फ आतंकी गतिविधियों और पाकिस्तान स्थित हैंडलरों से बातचीत के लिए इस्तेमाल होता था।

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अल फलाह यूनिवर्सिटी
– फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
पाकिस्तानी हैंडलरों से व्हाट्सएप-टेलीग्राम पर संपर्क
अधिकारियों ने बताया कि इन तथाकथित ‘टेरर फोन्स’ के जरिए आरोपी व्हाट्सएप और टेलीग्राम जैसे एप्स पर पाकिस्तान में बैठे हैंडलरों-जिनके कोडनेम ‘उकासा’, ‘फैजान’ और ‘हाशमी’ बताए गए हैं, से संपर्क में रहते थे। विस्फोट से पहले मारा गया डॉ. उमर नबी भी इसी नेटवर्क का हिस्सा था, जो विस्फोटक से लदी गाड़ी चला रहा था।

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दिल्ली में धमाके के बाद जले वाहन
– फोटो : ANI
आधार के दुरुपयोग से जारी हुईं घोस्ट सिम
जांच में यह भी सामने आया कि इन सेकेंडरी मोबाइल फोनों में लगी सिम कार्ड्स निर्दोष नागरिकों के नाम पर जारी की गई थीं, जिनके आधार विवरण का दुरुपयोग किया गया। जम्मू-कश्मीर पुलिस ने एक अलग रैकेट का भी पर्दाफाश किया, जहां फर्जी आधार कार्ड के जरिए सिम जारी की जा रही थीं।

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डॉ. मुजम्मिल
– फोटो : अमर उजाला
सीमा पार भी एक्टिव रहीं मैसेजिंग आईडी
सुरक्षा एजेंसियों ने एक गंभीर ट्रेंड की ओर इशारा किया है। इन सिम कार्ड्स से जुड़े मैसेजिंग अकाउंट्स पाकिस्तान या पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) में भी लगातार एक्टिव पाए गए। एप्स की उस तकनीकी सुविधा का फायदा उठाया गया, जिसमें बिना फिजिकल सिम के भी एप चलाए जा सकते हैं।
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