नई दिल्ली. हिंदी सिनेमा और संगीत की दुनिया में एक ऐसा सिंगर-अभिनेता हुआ, जिसकी आवाज में दर्द, मोहब्बत और टूटे दिल की गहराई बसती थी. वह अपनी आदतों को लेकर विवादों में रहा, शराब की लत ने उसकी जिंदगी को धीरे-धीरे घेर लिया, लेकिन उसकी गायकी का जादू ऐसा था कि खुद लता मंगेशकर तक उसकी दीवानी थीं. उन्होंने खुले मंच से उसे अपना ‘गुरु’ माना और यह तक कहा कि अगर मौका मिलता तो वह उससे शादी करना चाहती थीं. इस कलाकार ने ऐसे-ऐसे एवरग्रीन गीत दिए, जो आज भी रेडियो, शादियों और क्लासिक प्लेलिस्ट का हिस्सा हैं. उसकी आवाज में गाया हर गीत मानो दिल से निकला हुआ अफसाना लगता था. निजी जिंदगी में अकेलापन, संघर्ष और नशे की गिरफ्त…लेकिन कला में बेमिसाल ऊंचाई. यह कहानी है उस शख्स की, जिसने कम उम्र में इतिहास रच दिया और बहुत जल्दी इस दुनिया से विदा हो गया, मगर जिसकी आवाज आज भी जिंदा है.
कुंदन लाल सहगल को भारतीय सिनेमा का पहला ‘सुपरस्टार’ कहा जाता है. ऐसा भी कहा जाता है कि केएल सहगल के होने मात्र से फिल्में सुपरहिट हो जाती थीं. आज जब हम संगीत की दुनिया में ‘मेलोडी’ की बात करते हैं, तो उसकी नींव रखने वाले शख्स भी कुंदन लाल सहगल ही थे. 11 अप्रैल 1904 को जम्मू के नवा शहर में जन्मे कुंदन के घर में संगीत की कोई खानदानी विरासत नहीं थी. पिता तहसीलदार थे, लेकिन मां केसर बाई के भजनों ने बालक कुंदन के भीतर सुरों का बीज बो दिया. सहगल की तालीम किसी उस्ताद के घर पर नहीं, बल्कि सूफी संतों की दरगाहों और रामलीला के मंचों पर हुई.
रेलवे में टाइमकीपर और बाद में टाइपराइटर से बने सिंगर
शायद ही कोई जानता हो कि फिल्मों में आने से पहले केएल सहगल ने रेलवे में टाइमकीपर और बाद में टाइपराइटर बेचने वाले सेल्समैन के तौर पर भी काम किया. सेल्समैन की इसी नौकरी ने उन्हें पूरे भारत की खाक छानने का मौका दिया, जिससे उन्होंने अलग-अलग भाषाओं और सुरों को अपने भीतर उतार लिया. 1930 का दशक भारतीय सिनेमा के लिए ‘बोलती फिल्मों’ का नया दौर था. सहगल कोलकाता पहुंचे और ‘न्यू थिएटर्स’ के बीएन सरकार ने उनकी आवाज की खनक पहचान ली. शुरुआत ‘सहगल कश्मीरी’ नाम से हुई, लेकिन 1935 में आई फिल्म ‘देवदास’ ने इतिहास रच दिया.
सहगल ने गालिब की करीब 20 गजलों को अपनी आवाज दी थी.
‘देवदास’ को सहगल ने किया अमर
शरत चंद्र चट्टोपाध्याय के ‘देवदास’ को सहगल ने अपनी आवाज और अभिनय से अमर कर दिया. ‘बालम आए बसो मोरे मन में’ जैसे गीतों ने उन्हें घर-घर की पहचान बना दिया. वह दौर ऐसा था कि लोग ग्रामोफोन रिकॉर्ड्स सिर्फ इसलिए खरीदते थे क्योंकि उन पर सहगल का नाम होता था. केएल सहगल की आवाज में एक खास किस्म की ‘नोजल टोन’ थी. शास्त्रीय संगीत के दिग्गज उस्ताद फैयाज खान ने जब उन्हें गाते सुना, तो दंग रह गए. सहगल ने मिर्जा गालिब की गजलों को जो रूह दी, वह आज भी मील का पत्थर है. ‘नुक्ताचीं है गमे-दिल’ या ‘आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक’ सुनकर ऐसा लगता है मानो गालिब ने ये शब्द सहगल की आवाज के लिए ही लिखे थे.
संगीत के ‘कुंदन’ थे सहगल
सहगल सचमुच संगीत के कुंदन थे. सहगल की उदारता के कई किस्से मिलते हैं. कहते हैं कि न्यू थिएटर्स के ऑफिस से उनकी सैलरी सीधे उनके घर पहुंचाई जाती थी, क्योंकि अगर उनके हाथ में पैसे होते तो आधा वह शराब में उड़ा देते, बाकी जरूरतमंदों में बांट देते. एक बार उन्होंने पुणे में एक विधवा को हीरे की अंगूठी दे दी थी.
रिकॉडिंग से पहले पीते थे शराब, बनता था खास पेग
कुंदन लाल सहगल के व्यक्तित्व से जुड़ी एक और बात उनकी शराब की लत भी थी. वह अक्सर रिकॉर्डिंग से पहले शराब मांगते थे, जिसे वह कोड वर्ड में ‘काली पांच’ (एक खास पेग) कहते थे. दिग्गज संगीतकार नौशाद ने फिल्म ‘शाहजहां’ (1946) के दौरान उन्हें बिना शराब पिए ‘जब दिल ही टूट गया’ गाने के लिए राजी किया. जब सहगल ने वह गाना सुना तो खुद भावुक हो गए और माना कि उनकी आवाज बिना नशे के कहीं ज्यादा साफ और दर्दभरी थी. अफसोस, यह समझ आने तक बहुत देर हो चुकी थी. शराब ने उनके लिवर को खराब कर दिया था. 18 जनवरी 1947 को, जब देश आजादी की दहलीज पर खड़ा था, यह सुरों का शहंशाह दुनिया को अलविदा कह गया.
दीवानी थीं लता मंगेशकर, मानती थी ‘गुरु’
लता मंगेशकर केएल सहगल को अपना गुरु मानती थीं. किशोर कुमार ने जीवन भर सहगल के गीतों को किसी फिल्म में ‘रीमेक’ करने से इसलिए मना किया क्योंकि वह उन्हें ‘गुरु’ मानते थे. भारत रत्न सम्मानित लता मंगेशकर सहगल से बहुत प्रभावित थीं कि कहा जाता है कि वह उनसे शादी करना चाहती थीं. सहगल के निधन के बाद वह सहगल का स्केल चेंजर हारमोनियम अपने पास रखना चाहती थीं, पर सहगल की बेटी ने उसे अपने पास रखते हुए सहगल की रतन जड़ी अंगूठी लता को दे दी थी.
‘दुख के अब दिन बीतत नाही…’
आज भी जालंधर का ‘केएल सहगल मेमोरियल हॉल’ उनकी यादें समेटे खड़ा है. कुंदन लाल सहगल एक ऐसे कलाकार थे जिन्होंने सादगी में महानता खोजी. उन्होंने गजल को महफिलों से निकालकर आम आदमी की जुबां तक पहुंचाया. आज भी जब कहीं पुरानी यादों का जिक्र होता है, सहगल की वह आवाज कानों में रस घोल देती है, ‘दुख के अब दिन बीतत नाही…’
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