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हर्षा रिछारिया ने साध्वी जीवन छोड़कर ग्लैमर की दुनिया में वापसी कर ली है. उन्होंने इसकी वजह बताते हुए धार्मिक गद्दियों पर बैठे लोगों पर परेशान करने का आरोप लगाया. उन्होंने साफ कहा कि सनातन धर्म नहीं छोड़ा है, लेकिन वह जिंदगी की हकीकत को नजरअंदाज नहीं कर पाईं.
नई दिल्ली: हर्षा रिछारिया का बयान धर्म और निजी स्वतंत्रता के बीच के द्वंद्व को दर्शाता है. ग्लैमर की दुनिया में उनकी वापसी न केवल उनकी आर्थिक जरूरतों को पूरा करने की कोशिश है, बल्कि उन रूढ़ियों के खिलाफ एक विरोध भी है जो किसी व्यक्ति को उसकी शर्तों पर आगे बढ़ने से रोकती हैं. उन्होंने साध्वी के जीवन को विराम देकर वापस अपने पुराने काम यानी ग्लैमर की दुनिया में लौटने का बड़ा फैसला लिया है. हर्षा का कहना है कि धार्मिक व्यवस्था के भीतर कुछ प्रभावशाली लोगों के कारण उन्हें यह कदम उठाना पड़ा है.
हर्षा ने समाचार एजेंसी आईएएनएस (IANS) से बातचीत में बताया कि संन्यास की राह पर चलने के लिए उन्होंने अपना करियर दांव पर लगा दिया था, लेकिन व्यावहारिक जीवन की चुनौतियों ने उन्हें हकीकत का आइना दिखाया. उन्होंने कहा, ‘अंत में मुझे एहसास हुआ कि मैं पूरी तरह दान और भेंट पर निर्भर नहीं रह सकती. अगर राशन भी खरीदना है, तो पैसे की जरूरत होती है. धर्म का प्रचार तभी सार्थक है जब आपके पास स्वयं के संसाधन हों.’ हर्षा का मानना है कि अपनी जिम्मेदारियों को निभाने के लिए आर्थिक रूप से स्वतंत्र होना जरूरी है.
गद्दी पर बैठे लोगों पर आरोप
हर्षा ने किसी का नाम लिए बिना कुछ साधु-संतों और धार्मिक ‘गद्दियों’ पर बैठे लोगों पर उन्हें परेशान करने का आरोप लगाया. उन्होंने दर्द साझा करते हुए कहा कि कुछ लोग नहीं चाहते कि वह आगे बढ़ें और समाज के लिए कार्य करें. हर्षा के अनुसार, उनके हर काम में बाधाएं खड़ी की गईं और उनके चरित्र पर भी उंगलियां उठाई गईं. उन्होंने सवाल किया, ‘किसी के जीवन में बार-बार अड़चनें पैदा करना और यह तय कर लेना कि उसे आगे नहीं बढ़ने दिया जाएगा, क्या यह सही सोच है?’
सनातन धर्म और भावी योजनाएं
सनातन धर्म को त्यागने के सवाल पर हर्षा ने साफ किया कि उन्होंने धर्म नहीं छोड़ा है, बल्कि केवल अपने धार्मिक कार्यक्रमों और सोशल मीडिया के जरिए किए जा रहे प्रचार पर विराम लगाया है. उन्होंने कहा, ‘मैं खुद को सनातनी धर्म में जन्म लेने के लिए भाग्यशाली मानती हूं, इसलिए धर्म को ‘अपनाने’ या ‘छोड़ने’ की बात कहना गलत है.’ महाकुंभ के बाद हर्षा का मुख्य उद्देश्य युवाओं, विशेषकर युवतियों और बच्चियों को धर्म के वास्तविक ज्ञान से जोड़ना था. लेकिन सहयोग के अभाव और निरंतर मिल रही चुनौतियों के कारण उन्होंने फिलहाल अपने काम के प्रबंधन को बदलने का निर्णय लिया है.
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