नई दिल्ली. सिनेमा कभी सपनों का जरिया हुआ करता था, जहां हर शुक्रवार को स्क्रीन पर एक नई दुनिया बनती थी. लेकिन, आज जब हम कोई भी फिल्म देखने जाते हैं तो अक्सर हमारे मन में एक सवाल आता है- ‘क्या मैंने यह कहानी पहले कहीं देखी है?’ आज के दौर में, फिल्म इंडस्ट्री ‘सीक्वल-मेनिया’ और ‘रीमेक कल्चर’ की गिरफ्त में है. जहां भी देखो, ‘पार्ट 2’-‘पार्ट 3’ या किसी साउथ इंडियन फिल्म का हिंदी अडैप्टेशन है. इससे लाजमी तौर पर यह बहस छिड़ जाती है- क्या ओरिजिनैलिटी का दौर खत्म हो रहा है?
क्या मेकर्स खेल रहे हैं सेफ गेम?
आज फिल्म बनाना सिर्फ एक कला नहीं, बल्कि करोड़ों डॉलर का बिजनेस है. जब कोई प्रोड्यूसर 200 या 500 करोड़ रुपये लगाता है तो वह ‘रिस्क’ लेने से बचना चाहता है. सीक्वल और रीमेक इस डर का सबसे आसान समाधान हैं. सीक्वल के पास पहले से ही एक फैनबेस होता है. ‘स्त्री 2’ या ‘दृश्यम 2’ की सफलता का आधा श्रेय उनके पहले पार्ट की पॉपुलैरिटी को जाता है. अगर कोई फिल्म तमिल या तेलुगु में ब्लॉकबस्टर थी तो मेकर्स मान लेते हैं कि वह नॉर्थ इंडिया में भी पसंद की जाएगी. यह एक ‘हिट फॉर्मूला’ को दोहराने की कोशिश है.
क्या खत्म हो रहे हैं नए आइडिया?
अक्सर आरोप लगाया जाता है कि लेखकों के पास नए आइडिया खत्म हो गए हैं. लेकिन क्या यह सच है? मेरे विचार से, ओरिजिनल कहानियां लिखी जा रही हैं, लेकिन उन्हें बड़े पर्दे पर लाने वाले कम लोग हैं. जब तक कोई कहानी किसी ‘यूनिवर्स’ (जैसे कॉप यूनिवर्स या स्पाई यूनिवर्स) का हिस्सा न हो, बड़े स्टूडियो उसमें निवेश करने से हिचकिचाते हैं. इससे नतीजा ये निकल रहा है कि एक लेखक के ओरिजिनल आइडिया अक्सर फाइलों में दबे रह जाते हैं और उन्हें एक पुरानी फिल्म की स्क्रीनप्ले को ‘नया लुक’ देने पर काम करने के लिए मजबूर होना पड़ता है.
नॉस्टैल्जिया का बिजनेस
हम इंसान अपनी यादों से प्यार करते हैं. फिल्ममेकर इस साइकोलॉजी का फायदा उठाते हैं. 90 के दशक के सुपरहिट गानों को रीमिक्स करना या किसी क्लासिक फिल्म का रीमेक बनाना दर्शकों के नॉस्टैल्जिया को भुनाने का एक तरीका है. लेकिन इस प्रोसेस में हम अक्सर ओरिजिनल काम की गरिमा को ठेस पहुंचाते हैं.
क्या ओरिजिनल सिनेमा सच में कहीं गुम होता जा रहा है?
सिक्के का दूसरा पहलू यह है कि जब भी कोई ओरिजिनल फिल्म आती है और लोगों का दिल जीतती है तो वह रीमेक के इस पहाड़ को हिला देती है. ‘कांतारा’, ’12th फेल’ या ‘लापता लेडीज’ जैसी फिल्मों ने साबित कर दिया है कि अगर दर्शकों को अच्छी और नई कहानी मिलती है, तो वे उसे पूरे दिल से अपनाते हैं. ओरिजिनल सिनेमा कहीं गुम नहीं हो रहा है, बल्कि यह बड़े बजट के सीक्वल और रीमेक से होने वाले शोर के खिलाफ संघर्ष कर रहा है.
ओरिजिनैलिटी का नया ठिकाना बना ओटीटी?
जहां बड़े पर्दे पर रीमेक का राज है, वहीं ओटीटी प्लेटफॉर्म (नेटफ्लिक्स, अमेजन प्राइम…) ओरिजिनल कहानियों के लिए वरदान साबित हुए हैं. यहां ‘पंचायत’, ‘मिर्जापुर’ और ‘द रेलवे मेन’ जैसी कहानियों ने रीमेक के दबाव के बिना तरक्की की है. इन सीरीजों ने मेनस्ट्रीम सिनेमा को यह मैसेज दिया है कि दर्शक कुछ नया देखने के लिए उत्सुक हैं.
फिल्मों का भविष्य क्या होगा?
अगर सिनेमा को जिंदा रहना है तो उसे रीसाइक्लिंग बंद करनी होगी. सीक्वल और रीमेक दर्शकों का ध्यान सिर्फ कुछ समय तक ही खींच सकते हैं. आखिरकार, इंसान का दिमाग हमेशा कुछ अनकही बातें सुनने और कुछ अनदेखी चीजें देखने के लिए तरसता है और ये बातें फिल्ममेकर्स को समझना होगा. रीमेक और सीक्वल सिनेमा का हिस्सा हो सकते हैं, लेकिन वे पूरे सिनेमा नहीं हो सकते. अगर ओरिजिनल कहानियों को बढ़ावा नहीं दिया गया तो आने वाली पीढ़ियों के पास अपनी कोई ऐसी फिल्म नहीं होगी जिसे वे ‘क्लासिक’ कह सकें.










