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वेब सीरीज ‘पंचायत’, ‘दुपहिया’, ‘बिल्लू’ और ‘टॉयलेट एक प्रेम कथा’ जैसी सीरीज-फिल्मों ने एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री में एक नया ट्रेंड सेट किया. ग्रामीण परिवेश में बनी बुनी गई इन कहानियों को ऑडियंस ने खूब पसंद किया. यह ये फिल्में और सीरीज कॉमेडी और फैमिली ड्रामा हैं, लेकिन हम आपको अब ग्रामीण परिवेश में बनी 7 क्राइम थ्रिलर और इमोशनल ड्रामा को बताने जा रहे हैं.
इन 7 फिल्मों और सीरीज में में आपको ग्रामीण पंजाब की ऐसी कहानियां देखने को मिलेंगी, जिन्हें देखकर आप सिहर जाएंगे. भारत की आजादी से सबसे ज्यादा प्रभावित पंजाब हुआ. इतना ही बाद के सालों में पंजाब के गांवों कई तरह के दंश भी झेलने पड़े. 1984 में इंदिरा गांधी की मौत के बाद पंजाब को और भी त्रासदी झेलनी पड़ी. इसके अलावा पंजाब के गांवों में पहुंची नशे का व्यापार भी किसी से छुपा नहीं है. यहां हम आपको सरसों के खेत दूर-दूर तक फैले हैं और सामाजिक ताने-बाने में कई जटिलताएं हैं. कौन-सी हैं ये सीरीज-फिल्में, आइए जानते हैं.

कोहरा: यह शानदार पुलिस ड्रामा पंजाब के गांवों में एक गंभीर हत्या की गुत्थी सुलझाता है. इसमें जहरीली मर्दानगी और पीढ़ियों से चले आ रहे मानसिक दर्द की परतें खुलती हैं. यहां की धुंध उन राज़ों का प्रतीक है, जो ग्रामीण परिवारों और संस्थाओं में छुपे हुए हैं.

कैट: रणदीप हुड्डा ने इसमें अपने करियर की सबसे बेहतरीन एक्टिंग की है. वह एक पूर्व मुखबिर की भूमिका निभाते हैं, जिसे ग्रामीण पंजाब के ड्रग माफिया में फिर से खींच लिया जाता है. यह सीरीज स्थानीय राजनीति, सीमा पार तस्करी और 1980 के दशक की बगावत के जख्मों को कच्चे रूप में दिखाती है.
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उड़ता पंजाब: यह फिल्म पंजाब में ड्रग्स की समस्या को सीधे तौर पर दिखाने वाली एक ऐतिहासिक फिल्म है. इसमें एक रॉकस्टार, एक प्रवासी मजदूर और एक डॉक्टर की जिंदगी को जोड़कर दिखाया गया है कि नशे की लत कैसे गांव के सबसे शांत हिस्सों तक पहुंच गई है.

अमर सिंह चमकीला: इम्तियाज अली की यह बायोपिक मशहूर लोक गायक चमकीला की कहानी है, जो ग्रामीण पंजाब की आत्मा को संगीत के जरिए दिखाती है. इसमें कला की आजादी और धार्मिक कट्टरता के बीच तनाव को उजागर किया गया है, और बताया गया है कि चमकीला के “कच्चे” गीत छोटे शहरों में लोगों के दिलों को कैसे छू गए.

माचिस: यह फिल्म 1980 के दशक की पंजाब बगावत की पृष्ठभूमि पर बनी है. इसमें दिखाया गया है कि कैसे निर्दोष युवाओं को सिस्टम की नाइंसाफी ने आतंकवाद की ओर धकेल दिया. यह फिल्म पंजाब के सबसे दर्दनाक और उथल-पुथल वाले दौर की याद दिलाती है.

पिंजर: यह फिल्म विभाजन के समय की है, जिसमें सीमा के गांवों में सांप्रदायिक हिंसा का दर्दनाक असर दिखाया गया है. इसमें एक महिला के संघर्ष को केंद्र में रखा गया है, जो अपहरण के बाद भी जिंदा रहती है. यह फिल्म उस समय के विस्थापन और पहचान के संकट को भावनात्मक रूप से दिखाती है.

पंजाब 1984: यह फिल्म एक मां की कहानी है, जो बगावत के दौर में अपने लापता बेटे की तलाश करती है. इसमें दिखाया गया है कि ग्रामीण घरों में लोग कैसे अधिकारियों और आतंकवादियों के बीच फंसकर चुपचाप दर्द सहते हैं, और संघर्ष की असली कीमत क्या होती है.
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