इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम (आरटीई)-2009 के तहत बच्चों को गुणवत्तापूर्ण अनिवार्य शिक्षा मिल सके, इसके लिए छात्र-शिक्षक अनुपात बनाए रखना राज्य की वैधानिक जिम्मेदारी है। ऐसे में शिक्षक की व्यक्तिगत सुविधाओं के बजाय छात्र हित सर्वोपरि है। इसी टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान की एकल पीठ ने प्रदेश सरकार की ओर से बेसिक शिक्षा परिषद के स्कूलों में शिक्षकों के स्थानांतरण के लिए जारी 14 नवंबर 2025 के शासनादेश को बरकरार रखते हुए पांच याचिकाएं निस्तारित कर दीं।
चित्रकूट से अरुण प्रताप सिंह समेत 38, मिर्जापुर से संगीता सिंह समेत 43, मैनपुरी से स्वदेश कुमार समेत 58, गोरखपुर से अभिषेक कुमार त्रिपाठी समेत 12, जालौन से अमनराज समेत छह शिक्षकों ने शासनादेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। याचियों के अधिवक्ताओं ने दलील दी कि शिक्षकों के स्थानांतरण को लेकर जारी शासनादेश मनमाना है। इसमें स्थानांतरण की स्पष्ट प्रक्रिया नहीं बताई गई है।
जुलाई के बजाय बीच सत्र नवंबर में शिक्षकों के समायोजन से पढ़ाई बाधित होती है। साथ ही अलग-अलग जिलों में अलग मानदंड अपनाए गए हैं। अपर मुख्य स्थायी अधिवक्ता ने दलील दी कि जिन विद्यालयों में शिक्षक कम या नहीं हैं, वहां बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है। ऐसे में सेवा शर्ताें के तहत समायोजन जरूरी है।










