पुखराज का महत्व: पुखराज रत्न गुरु ग्रह अर्थात बृहस्पति का प्रतिनिधि माना जाता है. इसे धारण करने से जीवन में ज्ञान, समृद्धि, आत्मविश्वास और सौभाग्य की वृद्धि होती है. ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, यह रत्न व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है और उसकी सोच को संतुलित बनाता है. पुखराज पहनने से व्यक्ति की निर्णय क्षमता मजबूत होती है, बुद्धि का विकास होता है और शिक्षा, करियर, विवाह तथा आर्थिक मामलों में सफलता प्राप्त होती है. इसके अलावा यह रत्न मानसिक शांति और अध्यात्मिकता को भी बढ़ाता है.
कब और किसे धारण करना चाहिए?
ज्योतिषीय दृष्टि से, कुंडली में गुरु की स्थिति देखकर ही पुखराज धारण करने का निर्णय लेना चाहिए. यदि गुरु पंचम, षष्ठ, अष्टम या द्वादश भाव में हो, तो किसी योग्य ज्योतिषी की सलाह अनिवार्य है. धनु और मीन लग्न के जातकों के लिए यह रत्न अत्यंत शुभ माना जाता है, क्योंकि इन राशियों के स्वामी स्वयं गुरु हैं. इसके अतिरिक्त, जब गुरु वृषभ, सिंह, तुला, कुंभ या मकर राशि में गोचर करता है, तब पुखराज धारण करने से अधिक लाभ होता है.
पुखराज पहनने का सबसे शुभ दिन गुरुवार माना गया है, विशेषकर जब उस दिन पुष्य नक्षत्र हो. इसे सूर्योदय के समय या सुबह 9 बजे से पहले धारण करना चाहिए. रत्न धारण करते समय “ॐ बृं बृहस्पतये नमः” मंत्र का जाप करना शुभ फल देता है. पुखराज को हमेशा सोने की अंगूठी या लॉकेट में जड़वाकर पहनना चाहिए. इसे दाहिने हाथ की तर्जनी (Index Finger) में धारण करना उत्तम रहता है. रत्न का वजन कम से कम 7 रत्ती होना चाहिए, जबकि 4 रत्ती से हल्का पुखराज पहनना अशुभ माना गया है. साथ ही, रत्न शुद्ध, पारदर्शी और दोषरहित होना चाहिए ताकि यह अपने संपूर्ण फल दे सके.
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