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Best Bollywood War Movie: 17 फरवरी 2017 भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक बड़ा मोड़ था. इस दिन रिलीज हुई ‘द गाजी अटैक’ ने बॉक्स ऑफिस की उन सभी गलतफहमियों को तोड़ दिया कि एक सफल फिल्म के लिए बड़े सुपरस्टार या मसाला कंटेंट जरूरी होता है. भारत की पहली अंडरवाटर वॉर फिल्म मानी जाने वाली यह फिल्म 1971 के भारत-पाक युद्ध की एक अनकही बहादुरी की कहानी थी, जिसने दर्शकों के रोंगटे खड़े कर दिए थे. चुपचाप रिलीज हुई इस फिल्म ने न सिर्फ सनसनी मचाई बल्कि अपनी क्वालिटी के लिए नेशनल अवॉर्ड भी जीता.
नई दिल्ली. जब 2017 में ‘द गाजी अटैक’ के ट्रेलर रिलीज हुए तो फिल्म पंडितों ने सोचा कि इसे लिमिटेड ऑडियंस ही देख पाएगी, लेकिन जैसे ही यह 17 फरवरी को बड़े पर्दे पर आई, हालात बिल्कुल अलग थे. डायरेक्टर संकल्प रेड्डी ने एक ऐसा सब्जेक्ट चुना था जो भारतीय सिनेमा में पहले कभी नहीं देखा गया था-‘सबमरीन वॉर’. यह फिल्म हिंदी और तेलुगु में एक साथ शूट की गई थी. उस समय बॉलीवुड में खान तिकड़ी और जाने-माने कपूर खानदान का दबदबा था, लेकिन इस फिल्म ने साबित कर दिया कि कंटेंट ही असली किंग है. फिल्म की सादगी और टेक्निकल डिटेल्स ने पहले दिन से ही दर्शकों को अपनी ओर खींचा.

फिल्म की कहानी 1971 की लड़ाई की एक असल जिंदगी की लेकिन रहस्यमयी घटना पर आधारित है. पाकिस्तान ने अपनी सबसे खतरनाक सबमरीन, PNS गाजी, भारतीय एयरक्राफ्ट कैरियर INS विक्रांत को तबाह करने के लिए भेजी थी. अगर गाजी अपने मिशन में कामयाब हो जाती, तो लड़ाई का नतीजा कुछ और होता.

फिल्म में दिखाया गया है कि कैसे इंडियन नेवी की सबमरीन, INS राजपूत (फिल्म में INS S-21) ने समुद्र की गहराई में गाजी को रोका. पानी के नीचे की वह लड़ाई, जिसमें न कोई रोशनी थी और न ही बचने का कोई रास्ता, फिल्म का एक हिस्सा है जो आज भी दर्शकों के दिलों को छू जाता है. ‘द गाजी अटैक’ की सफलता का एक बड़ा कारण इसकी कास्ट थी. राणा दग्गुबाती ने शांत नेवी ऑफिसर अर्जुन वर्मा के रोल में अपने करियर की सबसे अच्छी परफॉर्मेंस दी.
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इस बीच, केके मेनन ने कैप्टन रणविजय सिंह के किरदार में जान डाल दी. अतुल कुलकर्णी का शांत स्वभाव और तापसी पन्नू का छोटा लेकिन असरदार रोल फिल्म को पूरा करता है. ये एक्टर्स साबित करते हैं कि जब एक्टिंग गहरी हो, तो भारी डायलॉग डिलीवरी की जरूरत नहीं होती.

अक्सर यह माना जाता है कि वॉर फिल्मों के लिए सैकड़ों करोड़ के बजट की जरूरत होती है, लेकिन ‘द गाजी अटैक’ इस बात का केस स्टडी है कि बजट का समझदारी से इस्तेमाल कैसे किया जाए. मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो फिल्म का ज्यादातर हिस्सा एक सबमरीन सेट के अंदर शूट किया गया था. कम रिसोर्स के बावजूद, फिल्म के विजुअल इफेक्ट्स और साउंड डिजाइन इतने सटीक थे कि दर्शक सच में पानी का प्रेशर और सबमरीन के अंदर घुटन महसूस कर सकते थे.

फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर अपने बजट से कई गुना ज्यादा कमाई की, लेकिन इसकी असली जीत तब हुई जब इसे 65वें नेशनल फिल्म अवॉर्ड्स में बेस्ट तेलुगु फिल्म का अवॉर्ड मिला. नेशनल अवॉर्ड की मंजूरी से यह साफ हो गया कि यह फिल्म सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि भारतीय इतिहास का एक जरूरी डॉक्यूमेंट भी है. आज भी, नौ साल बाद जब देशभक्ति की बात होती है, तो ‘द गाजी अटैक’ को इज्जत से देखा जाता है. यह उन फिल्ममेकर्स के लिए प्रेरणा का काम करती है जो कम बजट में वर्ल्ड-क्लास फिल्में बनाने का सपना देखते हैं.

‘द गाजी अटैक’ सिर्फ एक फिल्म नहीं है, बल्कि उन गुमनाम शहीदों को श्रद्धांजलि है जिन्होंने समंदर की गहराइयों से देश की रक्षा की. 17 फरवरी 2017 को शुरू हुआ यह सफर आज भी दर्शकों के दिलों में जिंदा है. यह फिल्म हमें याद दिलाती है कि सच्ची बहादुरी अक्सर शोर नहीं करती, यह समंदर की गहराइयों की तरह शांत और पक्की होती है.
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