इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पति की मौत के बाद पत्नी से जबरन वसूली की कार्रवाई पर फाइनेंस कंपनी को कड़ी फटकार लगाई है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि याचिका के लंबित रहने तक पीड़िता को न तो कर्ज चुकाने के लिए मजबूर किया जाए और न ही वसूली एजेंट के जरिये डराया-धमकाया जाए।
यह आदेश न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ ने मेरठ निवासी मानसी त्यागी की याचिका पर दिया है। कोर्ट ने वसूली कार्रवाई पर रोक लगाते हुए बैंक और बीमा कंपनी को नोटिस जारी कर तीन सप्ताह में जवाब तलब किया है।
याचिका के मुताबिक याची के दिवंगत पति ने पीएनबी हाउसिंग फाइनेंस से ऋण लिया था, जिसे एक लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसी के जरिये कवर भी किया गया था। पति की मृत्यु के बाद जब बीमा कंपनी ने दावा खारिज कर दिया तो पीड़िता ने जिला उपभोक्ता फोरम का दरवाजा खटखटाया। फोरम में मामला लंबित रहने के दौरान ही बैंक ने कर्ज वसूली के लिए दंडात्मक कार्रवाई और दबाव बनाना शुरू कर दिया।
फोरम में पद खाली होने पर पहुंचीं हाईकोर्ट
बैंक की वसूली कार्रवाई के खिलाफ याची ने पहले जिला उपभोक्ता फोरम और फिर राज्य उपभोक्ता आयोग में गुहार लगाई थी। राज्य आयोग ने जिला फोरम मेरठ को मामले की दोबारा सुनवाई के निर्देश दिए थे। हालांकि, मेरठ स्थित जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग में सदस्यों का कार्यकाल समाप्त होने और नए सदस्यों की नियुक्ति न होने के कारण वहां सुनवाई ठप पड़ी थी। लिहाजा, मजबूरन याची को हाईकोर्ट की शरण लेनी पड़ी। कोर्ट ने राहत देते हुए मामले की छह अप्रैल को सूचीबद्घ करने का आदेश दिया है।











