इस एक्टर ने 1970 से 1980 के दशक में करीब 94 फिल्मों में एक्टिंग की. लेकिन जिन फिल्मों में उन्होंने काम किया, वो चंद ही फिल्में थीं, जिन्हें लोगों ने खूब प्यार दिया. माता- पिता दोनों संगीतकार रहे, लेकिन बेटे पर एक्टिंग का भूत सवार हुए और किस्मत को आजमाने के लिए वो पर्दे के सामने पहुंच गया. यह कहानी है फिल्ममेकर राकेश रोशन की, जिन्होंने अपने संघर्षों से सीख लेकर खुद को बॉलीवुड के सबसे सफल डायरेक्टर-प्रोड्यूसर के रूप में स्थापित किया.
मां-पापा दोनों थे संगीतकार
राकेश रोशन ने फिल्म ‘घर घर की कहानी’ से एक्टिंग की शुरुआत की.
17 साल के राकेश पर जब आईं घर की जिम्मेदारियां
एक्टिंग के दौरान मिलने वाली मुश्किलों को देखते हुए उन्होंने अपना सरनेम नागरथ से बदलकर रोशन कर लिया, ताकि प्रोड्यूसर्स को पता चल सके कि वह रोशन नागरथ के बेटे हैं. राकेश जब सिर्फ 17 साल के थे, तभी उनके पिता का निधन हो गया. परिवार की जिम्मेदारी संभालने के लिए उन्होंने असिस्टेंट डायरेक्टर का काम शुरू किया, लेकिन एक्टर बनने का सपना नहीं छोड़ा.
94 फिल्मों में किया काम, मगर सफलता नहीं मिली

नीतू कपूर ने एक बार उनके साथ काम करने से मना कर दिया था.
दोस्तों से उधार लेकर चलाया घर
संघर्ष के दिनों में राकेश को अपने परिवार पत्नी पिंकी रोशन, बेटी सुनैना और बेटे ऋतिक रोशन को पालना मुश्किल हो गया. वे अपने भाई और माता-पिता के साथ एक दो-बेडरूम फ्लैट में रहते थे. ऋतिक ने सिमी ग्रेवाल के शो रेंडेजवस में बताया था- ‘हम गद्दों पर सोते थे. धीरे-धीरे फर्नीचर आया. पापा के लिए वो वक्त बहुत मुश्किल था. राकेश रोशन ने द रोशन्स डॉक्यूमेंट्री में यह भी स्वीकार किया कि उस दौर में वे अक्सर दोस्तों से 5000 रुपये तक उधार लेते थे ताकि बिजली-पानी के बिल भर सकें.
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डायरेक्टर बनने का लिया रिस्क
1987 में राकेश रोशन ने एक्टिंग छोड़कर डायरेक्शन में हाथ आजमाया. अपनी पहली फिल्म ‘खुदगर्ज’ बनाने के लिए उन्होंने अपना घर और कार तक गिरवी रख दी.फिल्म सुपरहिट रही और इसके बाद ‘खून भरी मांग’, ‘किशन कन्हैया’ जैसी हिट फिल्मों ने उन्हें बॉलीवुड के टॉप डायरेक्टर्स में शामिल कर दिया. साल 2000 में उन्होंने अपने बेटे ऋतिक को ‘कहो ना प्यार है’ से लॉन्च किया, जो ऑल टाइम ब्लॉकबस्टर साबित हुई. इसके बाद ‘कोई मिल गया’ और ‘कृष’ सीरीज ने इस फादर-सन डुओ को बॉलीवुड का सबसे सफल डुओ बना दिया.
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