उत्तराखंड के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में प्रकृति का एक अनमोल औषधीय खजाना मिला है। जड़ी-बूटी शोध संस्थान (मंडल) से सेवानिवृत्त वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. विजय भट्ट ने धारचूला के बालिंग और सीपू जैसे दुर्गम इलाकों में चागा मशरूम की पहचान की है। यह मशरूम न केवल दुर्लभ है, बल्कि कैंसर जैसी घातक बीमारी से लड़ने में भी सक्षम पाया गया है।
वैज्ञानिकों के अनुसार, यह मशरूम केवल उन्हीं भोजपत्र के पेड़ों के तनों पर उगता है जिनकी आयु 100 वर्ष से अधिक हो चुकी है। डॉ. भट्ट ने बताया कि अब तक यह माना जाता था कि चागा मशरू(मइनोनोटस ओब्लिक्वस) मुख्य रूप से साइबेरिया और रूस के ठंडे जंगलों में ही पाया जाता है। लेकिन धारचूला और नीति घाटी में 3000 मीटर से अधिक की ऊंचाई पर इसकी मौजूदगी ने शोधकर्ताओं को उत्साहित कर दिया है। दिखने में यह जले हुए कोयले या मधुमक्खी के छत्ते जैसा भूरा-काला नजर आता है।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में ऊंची कीमत
चागा मशरूम की अंतरराष्ट्रीय बाजार में काफी मांग है। दिल्ली सहित बड़े महानगरों में साइबेरिया व रूस से आयातित चागा मशरूम 25 से 30 हजार रुपये प्रति किलो तक बिक रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इसके संरक्षण और वैज्ञानिक दोहन की दिशा में कदम उठाए जाएं तो सीमांत क्षेत्रों के ग्रामीणों को इससे आर्थिक लाभ मिल सकता है।











