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Bollywood Classic Movie : बॉलीवुड में कुछ फिल्में ऐसी भी है जो हर पीढ़ी को पसंद आती हैं. नई जनरेशन भी इन फिल्मों में दिखाई गई सच्चाई को दिल से महसूस करती है. ऐसी ही एक कालजयी फिल्म 1971 में पर्दे पर आई थी. फिल्म का क्लाइमैक्स इतना मार्मिक था कि थिएटर पर दर्शक रो पड़े थे. सबसे दिलचस्प तथ्य यह है कि फिल्म मेकर के मन में राजकपूर के प्यार भरे दो शब्दों से इस मूवी को बनाने का आइडिया आया था.

12 मार्च 1971 को बॉलीवुड के सुनहरे पर्दे पर एक कालजयी फिल्म आई थी जिसने राजेश खन्ना के स्टारडम को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया था. यह ऐसी फिल्म है जिसके बारे में कहा जाता है कि हर किसी को यह मूवी अपने जीवन में एक बार जरूर देखनी चाहिए. नाम है : आनंद. आनंद फिल्म के डायरेक्टर थे हृषिकेश मुखर्जी और प्रोड्यूसर थे एनसी सिप्पी. फिल्म की स्क्रिप्ट गुलजार और हृषिकेश मुखर्जी ने लिखी थी. फिल्म में राजेश खन्ना, अमिताभ बच्चन, जॉनी वॉकर, सुमिता सान्याल लीड रोल में नजर आए थे. फिल्म का म्यूजिक सलिल चौधरी ने दिया था. गीत योगेश गौड़ ने लिखे थे. फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सुपर हिट रही थी. आज यह मस्ट वॉच मूवी मानी जाती है. 53 साल भी इस मूवी का क्रेज कम नहीं हुआ है.

आनंद फिल्म के साथ भी कई मजेदार कहानियां जुड़ी हुई हैं. हृषिकेश मुखर्जी को आनंद फिल्म को बनाने की प्रेरणा राज कपूर से मिली थी. दोनों गहरे दोस्त थे. राज कपूर प्यार से उन्हें ‘बाबू मोशाय’ बोला करते थे. ‘बाबू मोशाय’ बंगाली भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है ‘ग्रेट जेंटल मैन’. बाद में ये दो शब्द आनंद फिल्म की पहचान बन गए.

आनंद फिल्म 30 लाख के बजट में बनी थी और करीब 1 करोड़ रुपये का कलेक्शन किया था. आनंद लो बजट की फिल्म थी. राजेश खन्ना फिल्म् की कहानी से इतने प्रभावित हुए थे कि उन्होंने अपनी फीस काफी हद तक माफ कर दी थी. सिर्फ 7 लाख रुपये फीस ली थी.

‘आनंद’ मूवी बनाने का आइडिया हृषिकेश के दिमाग में कहां से आया था, इसके पीछे का भी एक दिलचस्प किस्सा है. दरअसल, राजकपूर 1970 के आसपास बहुत बीमार पड़ गए थे. इस दौरान हृषिकेश जिस दौर से गुजरे, उसको उन्होंने दिल से महसूस किया. फिर इन भावों को एक फिल्म में उकेरने का फैसला लिया. हृषिकेश ने अपने एक इंटरव्यू में खुलासा किया था कि आनंद मूवी उनकी और राज कपूर की जिंदगी पर आधारित है.

राज कपूर की तबीयत ठीक न होने पर हृषिकेश ने शशि कपूर को फिल्म में लेना चाहा. शशि कपूर इस फिल्म को करने के इच्छुक नहीं थे. तब जाकर राजेश खन्ना की एंट्री फिल्म में हुई थी. ‘आराधना’ और ‘अमर प्रेम’ के बाद यह तीसरी फिल्म है जिसमें राजेश खन्ना का रोल हमेशा के लिए अमर हो गया.

आनंद फिल्म की शूटिंग सिर्फ 28 दिन में पूरी हुई थी. फिल्म के दो गाने ‘जिंदगी कैसे है पहेली हाय..’ और ‘कहीं दूर जब दिन ढल जाए..’ सुनकर आज भी आंखें भर आती हैं. पूरे जीवन का चित्र आंखों के सामने घूमने लगता है. ‘जिंदगी कैसे है पहेली हाय..’ मन्नाडे की आवाज में है. यह गाना सिर्फ आधे दिन में शूट हुआ था. ‘कहीं दूर जब दिन ढल जाए..’ गाने को मुकेश ने आवाज दी थी.

एक इंटरव्यू में हृषिकेश मुखर्जी ने बताया था फिल्म की शूटिंग मुंबई में की गई थी. फिल्म में मुंबई के आम जनजीवन के संघर्ष को आनंद की जिंदगी में दिखाया गया था. फिल्म में मराठी एक्ट्रेस सीमा देव भी नजर आई थीं. सीमा देव को देखते ही सेट पर राजेश खन्ना ने कहा था कि ‘आपको देखने को लिए हम लोग कभी दिनभर लाइन में लगे रहते थे.’

‘जिंदगी कैसे है पहेली हाय..’ गाने को शुरुआत में बैकग्राउंड में रखने का फैसला किया गया था लेकिन जब राजेश खन्ना को इस गाने को सुना तो उन्होंने गाने के लिए सिचुएशन क्रिएट करने का सुझाव दिया था. ‘कहीं दूर जब दिन ढल जाए’ गाने से हृषिकेश मुखर्जी इतने प्रभावित हुए थे उन्होंने गीतकार योगेश गौड़ से एक और गाना कुछ इसी अंदाज में लिखने का अनुरोध किया. योगेश ने फिर ‘जिंदगी कैसे है पहेली हाय..’ जैसा एक और कालजयी गाना लिखा.
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