साउथ में फिल्मों को सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक क्रांति की तरह माना जाता है. खासकर तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक में लाखों फैंस स्टार्स को भगवान की तरह मानते हैं, कई फैंस तो अपने घरों में इन स्टार्स की तस्वीर लगाते हैं. ऐसा यहां की संस्कृति, हालात और इतिहास की वजह से होता है. फिल्मों में हीरो के कैरेक्टर को इस तरह दिखाया जाता है कि असल जिंदगी में भी लोग इन्हें अपना देवता या मसीहा मानने लगते हैं. इसे कल्ट स्टेटस कहा जाता है.
उदाहरण के तौर पर एनटी रामाराव (NTR) ने 300 से ज्यादा फिल्मों में भगवान कृष्ण, राम जैसे रोल किए, जिससे उनके फैंस उन्हें असल जिंदगी में भी देवता मानने लगे. जयललिता के बारे में भी ये कहा जाता है कि साउथ के लोग उने थंंगा सिलाई यानी देवी की स्वर्ण प्रतिमा कहते थे. इसके अलावा साउथ सिनेमा की ज्यादातर फिल्में सामाजिक मुद्दों और गरीबी पर केंद्रित होती हैं, जिससे फैंस सीधे इन स्टार्स में अपना हीरो देखते हैं.
साउथ इंडियन सिनेमा इस तरह बनाया जा रहा है ताकि वह आम लोगों से जुड़ा रहे. यहां की फिल्मों में लैंग्वेज, कल्चर और वैल्यूज का प्रोटेक्टर माना जाता है. यहां की फिल्मों को देखना लोग अपनी जिम्मेदारी समझते हैं. यहां के हीरो को इस तरह प्रजेंट किया जाता है, ताकि वह पॉलिटिकल या सोशल मैसेज देने में सफल हो. इसीलिए साउथ सिनेमा में बोल्ड सीन दूर रखे जाते हैं, शुरुआत के समय तो ये बिल्कुल भी नहीं होते थे. साउथ में फिल्मी स्टार्स सिर्फ एंटरटेनर नहीं, बल्कि समाज का प्रतिनिधि माने जाते हैं. फिल्मों में दिखाए गए गरीबों के मसीहा या न्याय के योद्धा जैसे किरदार, जनता को उनके जातीय और सामाजिक संदर्भों से जोड़ देते हैं.
साउथ में पिछड़ी जातियों के नाम पर फैंस खूब जुटते हैं, फिल्मों में हीरो को गरीब और पिछड़ी जाति का ही दिखाया जाता है.इसका फायदा भी मिलता है, क्योंकि आंध्रप्रद्रेश में ही तकरीबन 60 प्रतिशत लोग पिछड़े और दलित हैं, यही हाल अन्य राज्यों का भी है. कल्चर स्टडीज के प्रोफेसर एसवी श्रीनिवास की किताब आफ्टर एनटीआर, तेलुगू मास फिल्म एंड सिनेमैटिक पॉपुलिज्म में इस बात का जिक्र है, इनमें कापू और कम्मा जाति के बारे में बताया गया है. लिखा है कि पहले कप्पू और कामा जाति के लोगों को कॉमेडियन या छोटे रोल मिलते थे, लेकिन बाद में इन जातियों से सुपरस्टार्स आए और लोगों के दिलों पर छा गए.
साउथ के लोगों का अपने चेहरे स्टार से जुड़ने का एक और कारण उनकी चैरिटी है. NTR से लेकर अल्लू अर्जुन तक सब इस चैरिटी में आगे हैं.रजनीकांत के बारे में तो यह मशहूर है कि वह अपनी कमाई का आधार हिस्सा अपने फेंस और जरूरतमंदों को दान करते हैं. पिछले साल वायनाड में हुई लैंड स्लाइड के रिलीफ फंड में भी उन्होंने 1 करोड़ रुपये दिए थे. उनके कई चैरिटेबल ट्रस्ट चलते हैं. इसके अलावा तेलुगु एक्ट महेश बाबू सालाना तकरीबन 30 करोड़ रुपये दान करते हैं.
अल्लू अर्जुन, थलपति विजय समेत साउथ के तमाम एक्टर्स चैरिटी लगे आगे हैं. खास बात ये है कि साउथ इंडस्ट्री की शुरुआत से ही यह सिलसिला चला आ रहा है. साउथ में एक किस्सा फेमस है कि एक बार 1950 में MGR ने एक रिक्शेवाले को बारिश में भीगीते हुए देखा तो 6000 रिक्शेवालों को बरसाती दान की. जयललिता ने अम्मा नाम से कैंटीन, बोतलबंद पानी, नमक आदि योजनाएं शुरू की थीं.
एक्टर ही नहीं उनके फैन क्लब भी इस मामले में आगे हैं. आंध्र-तेलंगाना में चिरंजीवी, पवन कल्याण और एनटीआर के फैंस राजनीतिक रैलियां आयोजित करते हैं. आंध्रप्रदेश की जनसेना पार्टी के नेता और केंद्रीय मंत्री पवन कल्याण के 49 वें जन्मदिन पर उनके फैंस क्लब ने तकरीबन 70 लाख रुपये के 600 ऑक्सीजन सिलेंडर बांटे थे. इसी तरह मलयालम एक्टर मामूट्टी के जन्मदिन पर केरल के सभी जिलों में रक्तदान शिविर लगाए गए थे.
इसके अलावा तमिलनाडु के सभी जिलों में एक्टर विजय की ओर से मुफ्त भोजन चलाए जाते हैं. इसके अलावा ये फैंस क्लब लोगों के इलाज, पढ़ाई और अन्य राहत कार्यों में भी मदद करते हैं, यये सभी फैन क्लब रजिस्टर्ड हैं. चिरंजीवी के 18 हजार रजिस्टर्ड फैन क्लब हैं तो विजय थलपति के 85 हजार से ज्यादा फैन क्लब हैं.
साउथ में फिल्में देखने का चलन भी ज्यादा है. अगर देश भर के लिहाज से देखें तो आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक और केरल जैसे साउथ स्टेट में सिनेमा हॉल का इंफ्रास्ट्रक्चर ज्यादा बेहतर है. सिनेमा प्रोफाइल वेबसाइट के मुताबिक देश में 9 हजार सिनेमा स्क्रीन हैं, इनमें 54 प्रतिशत साउथ के राज्यों में हैं. इनमें सबसे ज्यादा स्क्रीन 1097 आंध्रप्रदेश में है, जबकि 719 सीट कर्नाटक में हैं. मीडिया इन्वेस्टमेंट फर्म के मुताबिक साउथ के लोग साल में तकरीबन 22 फिल्में देखते हैं, यानी हर माह करीबन 1.8. कुछ लोग तो ऐसे हैं जो साल में 32 फिल्में तक देखते हैं.इनमें भी ज्यादातर छोटे शहरों से होते हैं.










