Cough Syrup: मध्य प्रदेश-राजस्थान में कफ सिरप पीने और इसके कारण हुई किडनी फेलियर से बच्चों की मौत के मामलों को लेकर हर तरफ चर्चा देखी जा रही है। मेडिकल रिपोर्टस में कहा जा रहा है कि इन सिरप में कुछ ऐसे कंपोनेंट्स जैसे डायथिलीन ग्लाइकॉल और एथिलीन ग्लाइकॉल की मौजूदगी थी, जिन्हें इंसानी सेहत के लिए कई प्रकार से खतरनाक बताया जाता रहा है। कई राज्यों में इस मामले के सामने आने के बाद ‘कोल्ड्रिफ सिरप’ को बैन तक कर दिया गया है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने सलाह दी है कि दो साल से कम उम्र के बच्चों को खांसी और जुकाम की दवाएं न दी जाएं।
डॉक्टर्स कहते हैं, 6 महीने से कम उम्र के बच्चों को कोई भी कफ सिरफ प्रिस्क्राइब ही नहीं किया जाना चाहिए। पांच साल से कम उम्र के बच्चों की सेहत, वजन, शारीरिक का मूल्यांकन करने के बाद डॉक्टर द्वारा प्रिस्क्राइब की गई दवा ही दी जानी चाहिए।
अब सवाल ये है कि जब बच्चों के लिए कफ सिरप्स इतने नुकसानदायक हो सकते हैं तो अब से बच्चों को सर्दी-जुकाम हो तो उन्हें क्या दवाएं दी जानी चाहिए? क्या बाजार में मिलने वाले आयुर्वेदिक कफ सिरप का इस्तेमाल किया जा सकता है? क्या आयुर्वेदिक कफ सिरप अच्छा विकल्प हो सकते हैं?

2 of 5
खांसी-जुकाम कीसमस्या
– फोटो : Freepik.com
घरेलू उपायों से सर्दी-खांसी में आराम
आमतौर पर बचपन से ही दादी-नानी, सर्दी-जुकाम होने पर मुलेठी, शहद, तुलसी जैसे घरेलू उपायों की सलाह देती थीं। बाजार में इन्हीं उत्पादों की लेबलिंग के साथ कई कफ सिरप आसानी से उपलब्ध होते हैं। चूंकि ये घरेलू उपाय सर्दी-खांसी होने पर आराम देते रहे हैं, तो स्वाभाविक है कि इनकी लेबलिंग के साथ बिकने वाले सिरप को भी लोग उतना ही विश्वसनीय मान लेते हैं।
क्या इस तरह के आयुर्वेदिक कफ सिरप का इस्तेमाल सुरक्षित हैं? क्या अब से बच्चों और बड़ों के लिए इनका इस्तेमाल किया जाना चाहिए। आइए इस बारे में विशेषज्ञ से समझते हैं।

3 of 5
कफ सीरप का इस्तेमाल
– फोटो : Adobe Stock
बच्चों के लिए दवाओं का इस्तेमाल
सबसे पहले ये समझना जरूरी है कि स्वास्थ्य विशेषज्ञों का स्पष्ट कहना है कि 6 माह से कम उम्र के बच्चों को कोई भी कफ सिरप दिया ही नहीं जाना चाहिए। यहां तक कि डॉक्टर्स सर्दी-खांसी के लिए सबसे ज्यादा प्रयोग में लाए जाने वाले घरेलू उपाय शहद को भी 6 माह से कम उम्र के बच्चों को न देने की सलाह देते हैं।
2 साल से कम उम्र के बच्चों को खांसी-जुकाम होने पर डॉक्टरी सलाह पर लक्षणों से राहत देने वाली दवाएं दी जानी चाहिए पर कफ सिरप नहीं। 5 साल से अधिक उम्र के बच्चों को डॉक्टर की सलाह पर उचित डोज में कुछ सिरप दिए जा सकते हैं।
जहां तक आयुर्वेदिक कफ सिरप, जिसमें तुलसी, शहद, अदरक के गुण होने के दावे और इसके लेबलिंग के साथ बेचा जाता है, डॉक्टर्स इन दवाओं के भी आम इस्तेमाल के पक्ष में नहीं हैं।

4 of 5
कफ सिरप के इस्तेमाल को लेकर बरतें सावधानी
– फोटो : Adobe Stock
क्या घरेलू उत्पादों वाले आयुर्वेदिक सिरप सुरक्षित हैं?
अमर उजाला से बातचीत में ग्रेटर नोएडा स्थित एक निजी अस्पताल में इंटरनल मेडिसिन के डॉक्टर श्रेय श्रीवास्तव कहते हैं, ये मामला हम सभी के लिए आंखें खोलने वाला है। घरों में पहले से कई नुस्खों का इस्तेमाल किया जाता रहा है, लोगों को इससे आराम भी मिल सकता है। हालांकि जब किसी चीज की पैकेजिंग करके उसे दवा के रूप में बेचा जाता है तो वहां रिसर्च के बड़ा रोल होता है। कितने लोगों पर इसका परीक्षण किया गया है, कितने रिसर्च पेपर जमा किए गए हैं।
जब बात इन घरेलू चीजों का इस्तेमाल करके आयुर्वेदिक दवाओं की आती है तो इसके कितने रिसर्च हुए हैं वह बहुत स्पष्ट नहीं होता है। कई बार इस तरह की दवाओं में मेटल्स हो सकते हैं जो लेवल पर मेंशन भी नहीं होते हैं जिसके बाद में कई साइड इफेक्टस होने का खतरा देखा जाता रहा है।

5 of 5
बच्चों में खांसी की समस्या
– फोटो : Freepik.com
विज्ञापन देखकर या खुद से न लें कोई भी दवा
डॉक्टर श्रेय कहते हैं, हम आयुर्वेदिक दवाओं या इस तरह के कफ सिरप के खिलाफ नहीं हैं पर अगर आप विज्ञापन देखकर इस तरह की कोई दवा खुद से ले रहे हैं तो ये तुरंत बंद कर दें। सेल्फ मेडिकेशन से बचें, ये बहुत खतरनाक है।
बाल रोग विशेषज्ञ डॉ सरिता शर्मा कहती हैं, कई बार हम लोग भी शहद-अदरक का जूस मिलाकर लेने की सलाह देते हैं, इससे आराम भी मिलता है। पर जब ये दवाओं के रूप में आती हैं तो इनमें कई और भी चीजें मिली हो सकती हैं जिनपर रिसर्च कम होता है और लेबल पर उनके कंपोजिशन भी स्पष्ट नहीं होते हैं। ऐसे में इन दवाओं के भी खुद से इस्तेमाल से बचाना चाहिए।
हमेशा वही दवाएं लें जो डॉक्टर्स ने आपके शरीर की सभी स्थितियों का मूल्यांकन करने के बाद प्रिस्क्राइब की हों।
—————-
नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्टस से एकत्रित जानकारियों के आधार पर तैयार किया गया है।
अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
![]()











