चार बेगुनाहों को फर्जी केस में फंसाने वाले आरोपी पुलिसकर्मियों ने खुद को बचाने के लिए खूब खेल किया था। पहली बार जब विवेचना एंटी करप्शन विभाग को ट्रांसफर हुई तो जुगाड़ लगाकर वापस कृष्णानगर थाने ट्रांसफर करवा ली थी। पीड़ित पक्ष ने शासन में शिकायत की तब दोबारा विवेचना एंटी करप्शन को सौंपी गई, जिसके बाद आरोपी बेनकाब हुए।
पीड़ित लालता सिंह ने बताया कि जब केस दर्ज होने की जानकारी हुई तो पत्नी रंजना सिंह ने डीजीपी मुख्यालय स्थित लोक शिकायत प्रकोष्ठ में शिकायत की थी। शिकायत में उन्होंने बताया कि पुलिस ने झूठा केस लिखकर उनके पति व बेटों को आरोपी बनाया है। दावा किया कि पुलिस ने गिरफ्तार आरोपियों के पास से जी बिल फर्जी दिखाया है, यह बिल असली है। शिकायत के बाद बंधरा थाने में दर्ज चोरी के मामले की विवेचना एंटी करप्शन को दे दी गई। एंटी करप्शन की विवेचना में फर्जी केस की परतें खुलने लगीं।
ये भी पढ़ें – आसान नहीं बांग्लादेशी और रोहिंग्या घुसपैठियों की पहचान, अधिकतर खुद को पूर्वोत्तर राज्यों का बताते हैं निवासी
ये भी पढ़ें – …तो प्रदेश की 60 हजार से ज्यादा वक्फ संपत्तियों का नहीं हो पाएगा पंजीकरण, रजिस्ट्रेशन का समय हुआ पूरा
इस बीच आरोपियों ने जुगाड़ से जांच को एंटी करप्शन से वापस कृष्णानगर थाने ट्रांसफर करवा लिया था। कृष्णानगर पुलिस ने भी वर्ष 2022 में लालता सिंह व कल्लू गुप्ता को गिरफ्तार कर जेल भेजा और केस में चार्जशीट लगा दी। तब रंजना ने शासन स्तर पर शिकायत की। शासन ने केस एक बार फिर एंटी करप्शन के पास ट्रांसफर किया। इस बार आरोपी पुलिसकर्मियों का जुगाड़ नहीं चला और उन पर कार्रवाई की गई है।
बड़ा सवाल… आखिर किसके साथ मिलकर किया खेल ?
एंटी करप्शन की अब तक की जांच और एफआईआर से साफ है कि पुलिस वालों ने जानबूझकर फर्जी केस दर्ज किया था। अब तक ये सामने नहीं आया कि उसकी वजह क्या थी? एंटी करप्शन के जांच अधिकारी ने भी इस बारे में कोई जानकारी नहीं दी है। पीड़ित की आशंका है कि चूंकि वह राजनीति से जुड़ा हुआ है, इसलिए किसी विरोधी ने पुलिस वालों के साथ मिलकर उसको फंसाया। एक पहलू ये भी हो सकता है कि किसी अन्य मामले में आरोपी पुलिस वालों ने डील कर उन्हें फंसाया हो। मुख्य साजिशकर्ता का बेनकाब होना बाकी है। पुलिस को उसका सुराग मिल चुका है।












