प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शनिवार को दिल्ली के राय पिथौरा कल्चरल कॉम्प्लेक्स में भगवान बुद्ध से जुड़े पवित्र पिपरहवा अवशेषों की भव्य अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनी का उद्घाटन करेंगे। इसमें लोग बुद्ध से जुड़े उन पवित्र पिपरहवा अवशेषों को देख सकेंगे, जिन्हें इसी साल जुलाई में 127 वर्षों बाद विदेश से वापस लाया गया है।
इस अंतररराष्ट्रीय प्रदर्शनी में पिपरहवा से मिले प्रामाणिक अवशेषों और पुरातात्विक सामग्रियों को भी प्रदर्शित किया गया है जो राष्ट्रीय संग्रहालय, नई दिल्ली और भारतीय संग्रहालय, कोलकाता में संरक्षित रही हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शनिवार को एक सोशल मीडिया पोस्ट में इस प्रदर्शन का जिक्र करते हुए लिखा कि यह इतिहास और संस्कृति में रुचि रखने वालों के लिए एक महत्वपूर्ण दिन है।
प्रदर्शनी सुबह 11 बजे शुरू होगी, जिसका शीर्षक द लाइट एंड द लोटस: रेलिक्स ऑफ द अवेकन्ड वन रखा गया है। प्रधानमंत्री मोदी ने लिखा, यह प्रदर्शनी भगवान बुद्ध के नेक विचारों को और अधिक लोकप्रिय बनाने की हमारी प्रतिबद्धता के अनुरूप है। यह हमारे युवाओं और हमारी समृद्ध संस्कृति के बीच के बंधन को और गहरा करने का भी प्रयास है। मैं उन सभी लोगों की सराहना करता हूं, जिन्होंने इन पवित्र अवशेषों को स्वदेश वापस लाने में योगदान दिया। यह प्रदर्शनी विभिन्न विषयों पर आधारित खंडों में विभाजित है। आम लोगों की समझ को और बेहतर बनाने के लिए प्रदर्शनी में ऑडियो-विजुअल व्यवस्था की गई है।
संदेशों से जुड़ी जानकारी मिलेगी
प्रदर्शनी में इमर्सिव फिल्में, डिजिटल पुनर्निर्माण, व्याख्यात्मक प्रोजेक्शन और मल्टीमीडिया प्रस्तुतियां शामिल हैं, जिनके माध्यम से भगवान बुद्ध के जीवन, पिपरहवा अवशेषों की खोज, उनके संदेशों के प्रसार और उनसे जुड़ी कला परंपराओं की सरल और गहन जानकारी दी गई है। इसके केंद्र में सांची स्तूप से प्रेरित एक पुनर्निर्मित मॉडल रखा गया है, जिसमें राष्ट्रीय संग्रहों के प्रामाणिक अवशेषों के साथ स्वदेश लौटाए गए रत्नों को एक साथ प्रदर्शित किया गया है।
बुद्ध के प्रारंभिक जीवन से जुड़ा है पिपरहवा
पिपरहवा, सिद्धार्थनगर (यूपी) में स्थित एक प्राचीन बौद्ध स्थल है, जिसे भगवान बुद्ध के प्रारंभिक जीवन से जुड़ा माना जाता है। वर्ष 1898 में ब्रिटिश इंजीनियर विलियम क्लैक्सटन पेप्पे ने एक स्तूप की खुदाई के दौरान भगवान बुद्ध से जुड़े पवित्र अवशेषों की खोज की थी। औपनिवेशिक काल में इनमें अधिकांश अवशेष कोलकाता के इंडियन म्यूजियम में रखे गए, जबकि कुछ अवशेष पेप्पे के वंशजों के पास चले गए और विदेश पहुंच गए। करीब 127 वर्ष बाद, जुलाई 2025 में इन्हीं पवित्र अवशेषों को भारत वापस लाया गया।











