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लखनऊ में आयोजित एक सम्मेलन के दौरान जावेद अख्तर ने धर्म, राष्ट्रवाद और कम्युनिस्ट विचारधारा को लेकर अपने निजी अनुभव साझा किए. उन्होंने कहा कि जो लोग ईश्वर में विश्वास नहीं रखते, उनके लिए राष्ट्रवाद ही एक तरह का विकल्प बन जाता है. जावेद अख्तर ने अपने बचपन की एक दिलचस्प याद भी सुनाई, जब कम्युनिस्ट माहौल में पले-बढ़े होने के कारण उन्होंने घर में लगी स्टालिन की तस्वीर को अपना दादा समझ लिया था.
नई दिल्ली. जावेद अख्तर उन चंद बॉलीवुड सितारों की सूची में शामिल हैं जो किसी भी मुद्दे पर बेबाकी से अपनी राय रखने से कतराते नहीं है. एक बार फिर दिग्गज राइटर ने धर्म और राष्ट्रवाद को लेकर अपनी विचारधारा साझा की. उन्होंने कहा कि जो धर्म को मानते हैं और आस्तिक हैं उनके पास धर्म और राष्ट्रवाद में चुनने का विकल्प रहता है, लेकिन नास्तिक लोगों के पास सिर्फ राष्ट्रवाद का रास्ता है. जावेद अख्तर रविवार, 1 फरवरी को लखनऊ में एक एकाडेमी के सम्मेलन में शामिल होने पहुंचे थे.
इस एकाडमी के सम्मेलन के दौरान जावेद अख्तर ने अपनी निजी विचार साझा किए. वो अपनी राजनेतिक विचारधारा, आस्तिकता और नास्तिकता पर खुलकर बात करते हुए कहते हैं कि कई बार धर्म ही राष्ट्रवाद की परिभाषा बन जाता है, लेकिन जो नास्तिक होते हैं उनके पास सिर्फ राष्ट्रवाद का ही विकल्प रहता है.
जावेद अख्तर के पिता कम्युनिस्ट थे
इसके साथ ही राइटर कहते हैं कि उनका कम्युनिस्ट विचारधारा के साथ गहरा लगाव उनके परिवार की वजह से रहा है. वो कहते हैं कि जब बच्चा जन्म लेता है उसके काम में धर्म का नाम फूंक दिया जाता है और वो ताउम्र उसी धर्म को मानने लग जाता है. वो कहते हैं कि जब उन्होंने ग्वालियर में जन्म लिया तो किसी ने कहा कि पैदा होते ही बच्चे को अजान सुनाई जाती है, लेकिन उनका परिवार कम्युनिस्ट विचारधारा का था.
बचपन में स्टालिन को दादा मानते थे जावेद अख्तर
वो कहते हैं, ‘मेरे पिता और उनके तमाम दोस्त कट्टर कम्युनिस्ट थे. किसी की सलाह पर मेरे कानों में कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो के विचार भर दिए गए. हमारे घर की दीवार पर स्टालिन की तस्वीर टंगी रहती थी. मैं बहुत छोटा था, तब किसी ने मज़ाक में कह दिया कि यही तुम्हारे दादा हैं. बचपन की मासूमियत में मैंने उन्हें सचमुच अपना दादा मान लिया. लेकिन जब मैं पांच साल का हुआ, तब किसी ने समझाया कि वो तुम्हारे दादा नहीं हो सकते. उसी पल मुझे पहली बार एहसास हुआ कि तस्वीरों और हकीकत के बीच भी फर्क होता है’.
धर्म और विचारधारा के बारे में जावेद अख्तर कहते हैं कि धर्म में अच्छे और बुरे काम की बात की गई है, लेकिन धर्म हमें लालच और डर सिखाता है जो हमारी नैतिकता नहीं हो सकती है.
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प्रांजुल सिंह 3.5 साल से न्यूज18 हिंदी से जुड़ी हुई हैं. उन्होंने Manorama School Of Communication (MASCOM) से जर्नलिज्म और मास कम्यूनिकेशन में डिप्लोमा किया है. वो 2.5 साल से एंटरटेनमेंट डेस्क पर काम कर रही है…और पढ़ें
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