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साल (1937) में फिल्म ‘किसान कन्या’ भारत की पहली स्वदेशी रंगीन फिल्म थी. इससे पहले भारतीय फिल्में ब्लैक एंड व्हाइट ही थीं, हालांकि कुछ प्रिंट्स में सीमित रंग तकनीक या टिंटिंग के प्रयोग हुए थे. इससे पहले फिल्मों में हाथ से रंग भरकर कुछ फिल्मों के सीन्स को रंगीन किया जाता था जिसे कलर टिंट कहा जाता था. ऐसे में फिल्म में होली के सीन्स को अलग-अलग तकनीक की मदद से दर्शाया जाता था.
होली की एआई से बनाई फोटो.
नई दिल्ली. आज जब हम हिंदी सिनेमा में होली के रंगीन गीत जैसे ‘रंग बरसे’ या ‘होली के दिन’ देखते हैं, तो ये हमारी कल्पना के भी परे है कि एक दौर ऐसा था जब फिल्मों में कोई रंग नहीं हुआ करते थे. फिल्में पूरी तरह ब्लैक एंड व्हाइट हुआ करती थीं. उस समय रंगों के सबसे जीवंत त्योहार को पर्दे पर उतारना तकनीकी और रचनात्मक, दोनों लेवल पर एक बड़ी चुनौती थी. इन चैलेंजेस का सामना करते हुए मेकर्स ने पर्दे पर रंगों के त्योहार को जीवित कराने का अनोखा रास्ता ढूंढ़ निकाला था.
1930 और 40 के दशक में भारतीय सिनेमा मुख्य तौर पर ब्लैक एंड व्हाइट फिल्म स्टॉक पर शूट होता था. शुरुआती दौर में ऑर्थोक्रोमैटिक फिल्म का उपयोग होता था, जो लाल रंग को गहरे टोन में और नीले को हल्के टोन में दिखाती थी. बाद में पैनक्रोमैटिक फिल्म आई, जिसने अलग-अलग रंगों को ग्रे के अधिक रिलेटेबल शेड्स में बदलना संभव किया. इसका सीधा असर होली जैसे सीन्स पर पड़ा. निर्देशक और सिनेमैटोग्राफर समझने लगे कि कौन-सा असली रंग कैमरे पर किस ग्रे शेड में बदलेगा.
ब्लैक एंड व्हाइट फिल्मों में ऐसे भरे जाते थे रंग
स्क्रीन पर लाल, पीला या हरा सीधे दिखाई नहीं देता था, इसलिए कलाकारों के कपड़ों और सेट डिजाइन में ऐसे रंग चुने जाते थे जो ब्लैक एंड व्हाइट में अलग-अलग टोन पैदा करें. उदाहरण के लिए, लाल या मैरून रंग कैमरे पर लगभग काले जैसा दिख सकता था, जबकि पीला लाइट ग्रे बन जाता था.
कौन सी थी भारत की पहली रंगीन फिल्म?
साल (1937) में फिल्म ‘किसान कन्या’ भारत की पहली स्वदेशी रंगीन फिल्म थी. इससे पहले भारतीय फिल्में ब्लैक एंड व्हाइट ही थीं, हालांकि कुछ प्रिंट्स में सीमित रंग तकनीक या टिंटिंग के प्रयोग हुए थे. इससे पहले फिल्मों में हाथ से रंग भरकर कुछ फिल्मों के सीन्स को रंगीन किया जाता था जिसे कलर टिंट कहा जाता था.
लाइट्स से आते थे अलग-अलग कलर शेड्स
उस दौर में होली के सीन्स में सफेद कपड़े इसलिए पॉपुलर थे क्योंकि उन पर डाले गए रंग (जो ग्रे शेड्स में बदलते थे) साफ उभरते थे. गुलाल का असली रंग भले न दिखे, लेकिन चेहरे और कपड़ों पर बदलते टोन से ‘रंग लगने’ का एहसास पैदा होता था. इसके साथ इन सीन्स की शूटिंग में लाइट्स भी अहम रोल अदा करती थीं.
बदलते दौर के साथ रंगारंग हुई होली
धीरे-धीरे वक्त और दौर बदला फिल्में पूरी तरह बदल गईं. ब्लैक एंड व्हाइट कलर्स के बाद फिल्मों में रंग आए और फिर बदलते-बदलते फिल्मों की क्वालिटी इतनी बदल गई कि अब स्क्रीन के उस पार एक्टर्स के कपड़ों पर लगा हल्का-फुल्का दाग भी 4K क्वालिटी में नजर आता है, लेकिन आज भी फिल्मों में होली के लिए व्हाइट कपड़ों का चलन जारी है.
अब फिल्मों में होली बेहद रंगीन हो गई है. हर तरह की तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है जिनकी मदद से मोहब्बतें का गाना ‘सोनी सोनी’, ‘ये जवानी है दीवानी’ का गाना ‘बलम पिचकारी’, वेदा का गाना ‘होलियां’ और पद्मावत का गाना ‘होली आई रे’ जैसे शानदार गाने फिल्माए गए हैं.
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प्रांजुल सिंह 3.5 साल से न्यूज18 हिंदी से जुड़ी हुई हैं. उन्होंने Manorama School Of Communication (MASCOM) से जर्नलिज्म और मास कम्यूनिकेशन में डिप्लोमा किया है. वो 2.5 साल से एंटरटेनमेंट डेस्क पर काम कर रही है…और पढ़ें
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