‘आज धरती लहू पुकार रही है… सींच दो उसे दुश्मन की खून से…’ फिल्म ‘120 बहादुर’ में आपको ऐसे कई दमदार डायलॉग्स सुनने को मिलेंगे. फिल्म देखते हुए आप कई बार जोश से भर जाएंगे, तो कुछ सीन आपको सिहरन से भर देंगे. 21 नवंबर 2025 को सिनेमाघरों में रिलीज होने वाली इस फिल्म में फरहान अख्तर आपको बिल्कुल नए अंदाज में नजर आएंगे. ‘तूफान’ के चार साल बाद, उन्होंने ‘120 बहादुर’ के साथ बड़े पर्दे पर धमाकेदार वापसी की है. यह फिल्म मुझे ‘बॉर्डर’, ‘केसरी’ और ‘शेरशाह’ जैसी फिल्मों की याद दिलाती है. ‘बॉर्डर’ की तरह, फिल्म भी हर सैनिक की कहानी से शुरू होती है, और युद्ध के दौरान आपको ‘केसरी’ की झलकियां देखने को मिलेंगी, जहां 120 सैनिक 3,000 चीनी सैनिकों का सामना करते हैं.
फिल्म की कहानी 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान रेजांग ला की लड़ाई पर आधारित है, जहां 3,000 चीनी सैनिकों ने एक भारतीय चौकी पर हमला किया था. उस समय, मेजर शैतान सिंह (फरहान अख्तर) की कमान में 13वीं कुमाऊं रेजिमेंट की केवल एक कंपनी भारतीय चौकी पर तैनात थी, जहां 120 सैनिक तैनात थे. इस युद्ध में 6 भारतीय सैनिकों को छोड़कर बाकी सभी शहीद हो गए थे.
फिल्म का सबसे मजबूत पहलू इसका 20 मिनट का क्लाइमैक्स है, जो आपको अपनी सीट से बांधे रखेगा. फर्स्ट हाफ में फरहान जिस तरह से अपने डायलॉग बोलते हैं, वह आपको ‘जिंदगी मिलेगी ना दोबारा’ के उनके किरदार की याद दिलाएगा, लेकिन सेकंड हाफ में उनकी दहाड़ आपको जोश से भर देगी. ‘120 बहादुर’ 1962 के रेजांग ला युद्ध में भारतीय सैनिकों के साहस और बलिदान को एक भावभीनी श्रद्धांजलि है. मेजर शैतान सिंह भाटी (पीवीसी) के रूप में फरहान अख्तर इस फिल्म की रीढ़ हैं, जिन्होंने व्यापक देशभक्ति और गहरी व्यक्तिगत भावनाओं के बीच खूबसूरती से संतुलन बनाया है. सेना प्रमुख के आलोचकों ने भी इसकी सच्ची भावनाओं की प्रशंसा की है.
शुरुआत से ही, यह फिल्म खुद को एक साधारण युद्ध-थीम वाली फिल्म नहीं बनने देती. फिल्म का पहला भाग किरदारों को जीवंत बनाने में समय लगाता है, उनकी दोस्ती और चार्ली कंपनी के सैनिकों के मानवीय पलों को दिखाता है, बीच-बीच में हल्की-फुल्की कॉमेडी भी. दूसरा भाग और भी प्रभावशाली हो जाता है, जिसमें युद्ध की तीव्रता और भावनात्मक पहलुओं का खूबसूरती से मिश्रण है.
रजनीश घई का निर्देशन सराहनीय है. उन्होंने ऊंचाई पर युद्ध की क्रूर वास्तविकता और सैनिकों और उनके प्रियजनों के बीच के कोमल, मानवीय पलों, दोनों को बखूबी कैद किया है. यह फिल्म वास्तव में देशभक्ति और अजेय योद्धाओं की यात्रा का एक संपूर्ण पैकेज है, जिसमें प्रभावशाली छायांकन और मनोरम दृश्य हैं.
युद्ध के दृश्यों की कोरियोग्राफी से लेकर भावुक संगीत तक, सब कुछ कहानी को बिना किसी नाटकीयता के मजबूत बनाता है. फरहान फिल्म की कमान संभालते हैं, लेकिन उनके अधीन सैनिक भी अपनी सहज केमिस्ट्री और बेहद संवेदनशील अभिनय से चमकते हैं. युद्ध के मैदान से परे, फिल्म भावनात्मक रूप से भी प्रभावित करती है. बलिदान के दृश्यों को सम्मान के साथ प्रस्तुत किया गया है. उनकी पीड़ा को कम नहीं, बल्कि महिमामंडित किया गया है. जावेद अख्तर, जो अक्सर फरहान के कटु आलोचक रहे हैं, ने इसे ‘एक बेहतरीन फिल्म’ बताया और कहा कि कई सैनिकों की मौत को इतनी संवेदनशीलता से दिखाया गया है कि निर्देशक भी अपने आंसू नहीं रोक पाए, और हम इस बात से पूरी तरह सहमत हैं! मेजर शैतान सिंह के रूप में फरहान का किरदार आपका दिल जीत लेगा.
फरहान के अलावा, राशि खन्ना, विवान भटेना, अंकित सिवाच और अन्य सितारों ने अपनी-अपनी भूमिकाओं के साथ न्याय किया है. फिल्म में सबकी मेहनत साफ दिखाई देती है. अगर संगीत की बात करें तो ये ठीक-ठाक है, लेकिन बैकग्राउंड स्कोर शानदार है. फिल्म में कुछ कमियां भी उजागर हो सकती हैं. उदाहरण के लिए, अगर युद्ध के एक्शन की बात करें, तो आपको ‘केसरी’ और ‘शेरशाह’ जैसा ही एक्शन देखने को मिलेगा, लेकिन परफेक्शन में थोड़ी सी कमी निराश कर सकती है. फिल्म का पहला भाग थोड़ा धीमा है, जिससे आपको थोड़ी बोरियत महसूस हो सकती है. हालांकि, दूसरे भाग तक आते-आते, गति काफी बढ़ जाती है, और क्लाइमैक्स वाकई दमदार है. कुल मिलाकर, आप इस फिल्म को अपने पूरे परिवार के साथ सिनेमाघरों में देख सकते हैं. मेरी ओर से इस फिल्म को 5 में से 4 स्टार.










