राजस्थान के सिरोही जिले के रेवदर ब्लॉक स्थित रायपुर ग्राम पंचायत में हुए वित्तीय घोटाले की जांच रिपोर्ट सार्वजनिक होने के बाद बड़े खुलासे सामने आए हैं. तीन सदस्यीय कमेटी की रिपोर्ट में लगभग 21 लाख रुपये की अनियमितता पाई गई है. जिसमें तत्कालीन सरपंच एवं वर्तमान प्रशासक छगनलाल कोली और तत्कालीन ग्राम विकास अधिकारी फाऊलाल को दोषी ठहराया गया है.
जांच में सामने आया कि पंचायत प्रशासन ने गैर-मुमकिन रास्ते ओरण (सामुदायिक चरागाह) भूमि पर नियम विरुद्ध तरीके से पट्टे जारी किए. यह कार्य न केवल नियमों के विरुद्ध है, बल्कि राजस्व और सामुदायिक उपयोग की भूमि पर सीधा अतिक्रमण भी माना गया है.
बिना कार्य किए 21 लाख का हड़पे
रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि कई कार्यों का भौतिक सत्यापन नहीं हुआ, बावजूद इसके लगभग 21 लाख रुपये का भुगतान कर दिया गया. इसे गंभीर वित्तीय अनियमितता माना गया है. जांच कमेटी ने साफ तौर पर अनुशंसा की है कि वीडीओ फाऊलाल, प्रशासक छगनलाल कोली से अनियमित भुगतान की राशि वसूली की जाए.
इस मामले में ग्राम विकास अधिकारी ने अपनी रिपोर्ट जिला परिषद सीईओ को भेजते हुए यह सिफारिश की है कि वीडीओ फाऊलाल पर CCA नियमों के तहत कार्रवाई की जाए. साथ ही उन्होंने कहा कि प्रशासक छगनलाल कोली पर पंचायती राज अधिनियम के तहत कार्यवाही की जाए.
आरोपियों के खिलाफ होगी विभागीय कार्रवाई
मामले में अब जिला परिषद सीईओ करेंगे आगे की कार्रवाई की जा रही है. पूरा मामला जिला परिषद सीईओ के पास है, जो जांच रिपोर्ट के आधार पर आवश्यक विभागीय और कानूनी कार्रवाई तय करेंगे. जिला परिषद में वित्तीय अनियमितताओं से जुड़ी जांच रिपोर्ट 19 सितंबर 2025 को सीईओ कार्यालय सिरोही पहुंचने के बावजूद कार्रवाई क्यों नहीं हुई? यह सवाल अब तेजी से सुर्खियों में है.
रिपोर्ट के आते ही फाइल को दबाने, कार्रवाई टालने और उच्च नेतृत्व को सूचना न भेजने को लेकर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं. सवाल यह भी है कि जिला परिषद सीईओ की भूमिका इस पूरे प्रकरण में गंभीर सवालों के घेरे में है? जांच रिपोर्ट में सामने आई वित्तीय अनियमितताओं पर तुरंत विभागीय कार्रवाई होनी चाहिए थी, लेकिन दो महीने तक फाइल ठंडे बस्ते में पड़ी रही, ऐसा क्यों?
घटना पर खड़े हुए गंभीर सवाल
जांच में लाखों रुपये की वित्तीय अनियमितता उजागर हुई थी. ऐसे में स्वाभाविक तौर पर ज़िला परिषद स्तर पर तत्काल कार्रवाई, शक्तियों का निलंबन और रिपोर्ट राज्य सरकार को भेजे जाने की प्रक्रिया होनी चाहिए थी.
लेकिन बड़ा सवाल यह कि क्या सीईओ ने किसी भी स्तर पर कार्रवाई की? क्या राज्य सरकार को समय पर सूचना भेजी गई? या पूरी प्रक्रिया जानबूझकर रोकी गई? अब यह भी चर्चा में है कि राज्य सरकार की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति पर ऐसे मामलों में स्थानीय स्तर पर ही पलीता लगाया जा रहा है.
दो महीने में क्या कार्रवाई हुई?
जांच रिपोर्ट आने के बाद भी दो महीने तक किसी अधिकारी, कर्मचारी या जिम्मेदार व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई नहीं होना गंभीर सवाल खड़े करता है. सूत्र बताते हैं कि इस तरह की और भी कई फाइलें जिला परिषद कार्यालय में कार्रवाई की प्रतीक्षा में दबाकर रख दी गई होंगी? यदि ऐसा है तो यह न केवल प्रशासनिक उदासीनता का मामला है, बल्कि भ्रष्टाचार-रोधी तंत्र को कमजोर करने का भी संकेत है.
जिला परिषद स्तर पर फाइल दबाने जैसे मामलों को लेकर अब मांग उठ रही है कि पंचायती राज मंत्री, एसीबी और मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) इस पूरे मामले का स्वतः संज्ञान लें. सवाल यह कि जब वित्तीय अनियमितता का प्रमाण मौजूद है, तो कार्रवाई रोकने का कारण क्या था? क्या यह महज लापरवाही है या इसके पीछे कोई “बड़ा हित” काम कर रहा था?
मुख्यमंत्री से की जाएगी प्रकरण की शिकायत
स्थानीय लोगों और शिकायतकर्ताओं की ओर से यह मामला अब पत्राचार के माध्यम से मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा तक भेजा जा जा सकता है.!, ताकि जिम्मेदारों पर कार्रवाई सुनिश्चित हो सके और जिला परिषद के भीतर चल रहे फाइल दबाने के “तंत्र” की जांच हो सके.
Input By : तुषार पुरोहित










