नई दिल्ली: भारतीय सिनेमा में सामाजिक सच्चाई, इंसानियत और जज्बातों से भरी कहानियों की एक नई मिसाल पेश करने वाले तपन सिन्हा के नाम से शायद ही कोई अनजान हो, उन्होंने अपनी फिल्मों से उस दौर के घिसे-पिटे फॉर्मूले और पुराने रोमांटिक सिनेमा की बेड़ियों को तोड़ दिया था. फिल्ममेकर तपन सिन्हा ने ऐसी फिल्में बनाईं जो न सिर्फ समाज का असली चेहरा दिखाती थीं, बल्कि देश को जोड़ने का संदेश भी देती थीं. यही वजह है कि उनकी फिल्में आज भी लोगों के दिलों में बसी हुई हैं. 15 जनवरी को उनकी पुण्यतिथि है और आज का दिन सिनेमा के इस महान फनकार को याद करने का है.
2 अक्टूबर 1924 को जन्मे तपन दा को सत्यजीत रे, ऋत्विक घटक और मृणाल सेन के साथ भारतीय सिनेमा की चौकड़ी का हिस्सा माना जाता है. तपन सिन्हा के असाधारण फिल्मी सफर की शुरुआत साधारण थी. साल 1946 में उन्होंने कोलकाता के प्रसिद्ध न्यू थिएटर्स में साउंड इंजीनियर के रूप में काम शुरू किया था. वहां उन्हें महज 70 रुपए महीना वेतन मिलता था, लेकिन यहीं से सिनेमा का जादू उन्हें अपनी ओर खींचने लगा. साल 1950 में वह ब्रिटेन के पाइनवुड स्टूडियोज गए, जहां दो साल तक उन्होंने अंतरराष्ट्रीय फिल्म निर्माण की तकनीक सीखी. भारत लौटकर उन्होंने निर्देशन की ओर कदम बढ़ाया, जिसमें उनकी मां और दोस्तों का सहयोग मिला.
रवींद्रनाथ टैगोर से था गहरा लगाव
तपन दा का बचपन से ही रवींद्रनाथ टैगोर से गहरा लगाव था. स्कूल में एक दिन प्रिंसिपल ने टैगोर की कहानियां पढ़ीं, जिससे उनका साहित्य और संगीत से प्रेम बढ़ा. उनकी मां रवींद्र संगीत गाती थीं, जिसने उन्हें संगीत का महत्व सिखाया. लिहाजा तपन सिन्हा ने सिनेमा को सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज सुधार का माध्यम बनाया. उनकी फिल्में आज भी प्रासंगिक हैं.
इस फिल्म से की थी करियर की शुरुआत
उनकी पहली फिल्म साल 1954 में आई अंकुश थी, जो एक हाथी की कहानी पर आधारित थी. लेकिन असली पहचान मिली रवींद्रनाथ टैगोर की कहानी पर बनी काबुलीवाला से 1957 में रिलीज हुई थी. इस फिल्म ने कई पुरस्कार जीते और बर्लिन फिल्म महोत्सव में सर्वश्रेष्ठ संगीत का पुरस्कार भी हासिल किया. इसके बाद उन्होंने क्षुदीतो पाषाण, अपनजन, सगीना महतो, हाटे बाजारे, सफेद हाथी जैसी यादगार फिल्में बनाईं.
सामाजिक मुद्दों पर फिल्म बनाते थे तपन सिन्हा
तपन सिन्हा के फिल्मों की खासियत यह थी कि वह सामाजिक मुद्दों को बहुत संवेदनशीलता से उठाते थे. मजदूर अधिकार, पारिवारिक रिश्ते, सामाजिक अन्याय, बच्चों की दुनिया और फैंटेसी जैसी थीम्स पर उन्होंने काम किया. ‘सगीना’ में दिलीप कुमार ने मजदूर नेता का किरदार निभाया. ‘एक डॉक्टर की मौत’ में उन्होंने वैज्ञानिक की प्रतिभा और नौकरशाही की ईर्ष्या को दर्शाया. बच्चों के लिए ‘सफेद हाथी’ और ‘आज का रॉबिनहुड’ जैसी फिल्में बनाकर उन्होंने मनोरंजन के साथ शिक्षा भी दी.
तपन सिन्हा के नाम हैं 19 नेशनल अवॉर्ड
उनकी फिल्में न सिर्फ भारत में बल्कि बर्लिन, लंदन, मॉस्को जैसे अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में भी सराही गईं. उन्होंने बंगाली, हिंदी और उड़िया भाषाओं में 40 से ज्यादा फिल्में बनाईं. उनके नाम 19 नेशनल अवॉर्ड्स हैं और साल 2006 में उन्हें भारत का सर्वोच्च फिल्म सम्मान दादासाहेब फाल्के पुरस्कार मिला. 15 जनवरी 2009 में उन्होंने अंतिम सांस ली.











