आज के दौर में जहां कॉमेडी के नाम पर अक्सर फूहड़ता और डबल मीनिंग डायलॉग्स का सहारा लिया जाता है, वहां आज यानी 16 जनवरी 2026 को रिलीज हुई फिल्म ‘वन टू चा चा चा’ एक ताजी हवा के झोंके की तरह आती है, बिल्कुल एक साफ-सुथरी कॉमेडी. यह फिल्म साबित करती है कि बिना किसी शोर-शराबे और अश्लीलता के भी दर्शकों को लोटपोट किया जा सकता है. निर्देशक अभिषेक राज खेमका और रजनीश ठाकुर की यह फिल्म पूरी तरह से सिचुएशनल कॉमेडी और किरदारों के आपसी टकराव पर टिकी है, जो इसे एक बेहतरीन फैमिली एंटरटेनर बनाती है.
आशुतोष राणा का ‘कॉमिक अवतार’ इस फिल्म की सबसे बड़ी खूबी और दर्शकों के लिए सबसे बड़ा आकर्षण इसकी कास्टिंग है. पर्दे पर अब तक गंभीर भूमिकाओं, कड़क मिजाज पुलिसवाले या खूंखार विलेन के रूप में दिखने वाले दिग्गज अभिनेता आशुतोष राणा को एक कॉमेडी रोल में देखना अपने आप में एक चौंकाने वाला और सुखद अनुभव है. उनकी छवि इस फिल्म में बिल्कुल उलट है, जो दर्शकों की दिलचस्पी को शुरू से ही बांधे रखती है. आशुतोष राणा का यह नया रंग ही फिल्म की सफलता का सबसे बड़ा आधार बनता है.
फिल्म की कहानी की बात करें तो मोतिहारी से रांची तक का ‘पागलपन भरा’ सफर फिल्म की कहानी बिहार के मोतिहारी शहर से शुरू होती है, जहां जयसवाल परिवार में उत्सव का माहौल है. परिवार के बड़े बेटे संजू (ललित प्रभाकर) की सगाई की तैयारियां जोरों पर हैं. पूरा घर खुशियों में डूबा है, लेकिन तभी एक ऐसा धमाका होता है जो सबकी नींद उड़ा देता है. परिवार के सबसे उम्रदराज कुंवारे और स्वभाव से थोड़े सनकी ‘चाचा’ (आशुतोष राणा) अचानक ऐलान कर देते हैं कि उन्हें भी अब शादी करनी है.
चाचा की इस जिद और उनके व्यवहार को देखते हुए डॉक्टर उन्हें ‘बाइपोलर’ बताते हैं और सलाह देते हैं कि उन्हें बेहतर इलाज के लिए रांची के एक मानसिक संस्थान ले जाना चाहिए. यहीं से शुरू होती है फिल्म की मुख्य कहानी. दो भतीजे और उनका एक दोस्त, बेहोश और बंधे हुए चाचा को एक वैन में डालकर रांची के लिए निकलते हैं, लेकिन जिसे वे एक साधारण मेडिकल ट्रिप समझ रहे थे, वह जल्द ही एक ऐसी रोड-ट्रिप में बदल जाती है जहां कदम-कदम पर नई मुसीबतें और हंसी के फव्वारे इंतजार कर रहे होते हैं.
जब अपराधी और पुलिस हुए एक साथ यह यात्रा जितनी लंबी होती जाती है, उतनी ही अराजक भी. रास्ते में इस सफर में ऐसे-ऐसे किरदार जुड़ते जाते हैं कि कहानी का ग्राफ पूरी तरह बदल जाता है. एक सस्पेंड किया गया नारकोटिक्स ऑफिसर, एक डांसर जिसका नाम शोमा है, जेल से भागा हुआ शातिर अपराधी भूरा सिंह और एक जरूरत से ज्यादा जोश में रहने वाला पुलिसवाला- ये सब मिलकर इस सफर को ‘रोलर कोस्टर राइड’ बना देते हैं.
कहानी में ऐसे मोड़ आते हैं जहां गोलियां चलती हैं, बैंक डकैती की प्लानिंग होती है और गलती से ड्रग्स का एक बड़ा जखीरा भी हाथ लग जाता है, हालांकि ये स्थितियां थोड़ी ‘ओवर-द-टॉप’ जरूर लगती हैं, लेकिन फिल्म की अपनी दुनिया में ये सब बहुत लॉजिकल लगता है. दर्शक खुद को किरदारों के साथ इस पागलपन में शामिल महसूस करने लगते हैं.
आशुतोष राणा की ‘मास्टरक्लास’ परफॉर्मेंस अभिनय के मामले में यह फिल्म आशुतोष राणा के नाम रही है. ‘वेद प्रकाश जयसवाल चाचा’ के रूप में उनकी बॉडी लैंग्वेज और चेहरे के भावों में जो बारीकी है, वह काबिले तारीफ है. उन्होंने अपने किरदार को कभी भी जोकर नहीं बनने दिया, बल्कि एक मासूम और सनकी इंसान के बीच का संतुलन बनाए रखा. यही कारण है कि उनकी कॉमेडी बनावटी नहीं बल्कि स्वाभाविक लगती है.
अभिमन्यु सिंह, जो अक्सर नकारात्मक भूमिकाओं में दिखते हैं, यहां बेहद असरदार और मजेदार लगे हैं. नायरा बनर्जी ने ग्लैमर और एक्टिंग का सही मिश्रण पेश किया है. अनंत विजय जोशी, हर्ष मायर और अशोक पाठक जैसे युवा कलाकारों ने भी अपनी भूमिकाओं के साथ पूरा न्याय किया है. चितरंजन गिरी और हेमल इंगले ने सहायक भूमिकाओं में कहानी की गति को रुकने नहीं दिया.
संवादों में है असली जादू फिल्म के निर्देशक अभिषेक राज खेमका और रजनीश ठाकुर ने पूरी फिल्म को सिचुएशनल कॉमेडी की पटरी से उतरने नहीं दिया. फिल्म का एक बड़ा हिस्सा वैन और सड़क पर बीतता है. हालांकि कुछ जगहों पर फिल्म की रफ्तार थोड़ी धीमी पड़ती है और सफर थोड़ा लंबा महसूस होने लगता है, लेकिन कलाकारों की आपसी केमिस्ट्री और बेहतरीन संवाद उस कमी को ढक लेते हैं.
फिल्म के संवाद इसकी असली जान हैं. यहां ‘पंचलाइन’ मारने की कोशिश नहीं की गई है, बल्कि आम बातचीत से ही हास्य पैदा किया गया है. संवाद सरल हैं, बिहारी लहजे का पुट है और वे स्थिति के अनुसार बिल्कुल सटीक बैठते हैं. तकनीकी पक्ष और संगीत फिल्म की सिनेमैटोग्राफी रोड ट्रिप के दृश्यों को बखूबी पकड़ती है. छोटे शहरों के रास्तों और ढाबों का माहौल बहुत ही ओरिजिनल लगता है. बैकग्राउंड स्कोर फिल्म की ऊर्जा को बनाए रखता है, खासकर उन सीन्स में जहां अफरातफरी ज्यादा होती है.
‘वन टू चा चा चा’ एक ईमानदार और सधी हुई फिल्म है जो आपको बिना किसी मानसिक तनाव के हंसाने का वादा करती है. यह उन लोगों के लिए एक परफेक्ट ट्रीट है जो सिनेमाघर में कुछ समय के लिए दुनिया की टेंशन भूलकर खिलखिलाना चाहते हैं. आशुतोष राणा का नया अवतार और फिल्म के अजीबो-गरीब मोड़ आपको निराश नहीं करेंगे. अगर आप एक ऐसी फिल्म की तलाश में हैं, जिसे आप अपने परिवार के साथ बिना किसी झिझक के देख सकें और जो आपको अंत में एक सुखद अहसास के साथ बाहर भेजे तो ‘वन टू चा चा चा’ आपके लिए एक बेहतरीन विकल्प है. मेरी ओर से फिल्म को 5 में से 3 स्टार.










