Holi 2026 Special: होली की पड़वा पर नॉनवेज क्यों खाया जाता है? भारत के उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में होली के अगले दिन (प्रतिपदा/पड़वा) मांसाहार का सेवन एक प्राचीन ‘देशाचार’ (क्षेत्रीय परंपरा) है.
इसका मुख्य आधार ‘फाल्गुन अहेर’ (शिकार परंपरा), शाक्त मत (बलि विधान) और मध्यकालीन नवाबी-कायस्थ संस्कृति है. हालांकि सनातन धर्म के ग्रंथ सात्विकता पर जोर देते हैं, लेकिन ऐतिहासिक और भौगोलिक साक्ष्य इस ‘उत्सव भोज’ को सामाजिक मान्यता प्रदान करते हैं.
पंचांग और तिथि विज्ञान: क्यों ‘पड़वा’ ही बनी चयन?
यह समझना जरूरी है कि तिथियों का वैज्ञानिक महत्व क्या है. होली का समापन फाल्गुन पूर्णिमा को होता है, और उसके ठीक अगले दिन चैत्र कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा शुरू होती है. 4 मार्च 2026 को प्रतिपदा तिथि शाम 16:51 तक है. इस दिन पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र का प्रभाव है, जिसे ज्योतिष शास्त्र में आनंद, काम और उत्सव का नक्षत्र माना गया है.
प्रतिपदा को नए पखवाड़े की शुरुआत माना जाता है. लोक परंपराओं में किसी भी नई शुरुआत का जश्न ‘महाप्रसाद’ या भारी भोजन से करने की रीति रही है, जिसने कालांतर में मांसाहार का रूप ले लिया.
ऐतिहासिक प्रमाण: ‘फाल्गुन अहेर’ (The Royal Hunt)
इतिहास के पन्नों में इस परंपरा का सबसे विश्वसनीय प्रमाण राजपूताना की सैन्य संस्कृति में मिलता है. इसे ‘फाल्गुन अहेर’ कहा जाता था. मध्यकालीन भारत के क्षत्रिय कुलों में होली के समापन पर सामूहिक शिकार (अहेर) पर निकलने की परंपरा थी. मान्यता थी कि साल का पहला शिकार आने वाले युद्धों और कृषि के लिए ‘शुभ शकुन’ लेकर आता है.
प्रसिद्ध इतिहासकार कर्नल जेम्स टॉड ने अपनी कालजयी पुस्तक ‘Annals and Antiquities of Rajasthan’ में उल्लेख किया है कि मेवाड़ के राणा और अन्य राजपूत शासक होली के बाद जंगली जानवरों का शिकार करते थे.
शिकार करने के बाद मांस को ‘गढ़’ (किले) के भीतर पकाया जाता था और योद्धाओं के बीच वितरित किया जाता था. आज शिकार प्रतिबंधित है, लेकिन उस ‘विजय प्रतीक’ भोजन की याद में घरों में बकरे या मुर्गे का मांस बनाना एक सांस्कृतिक प्रतीक (Cultural Remnant) बन गया है.
अवध की ‘गंगा-जमुनी तहजीब’ और कायस्थों का योगदान
उत्तर भारत, विशेषकर अवध (लखनऊ) और इलाहाबाद बेल्ट में पड़वा पर नॉनवेज खाने को ‘खौआ’ या ‘बासी होली’ कहा जाता है. इसका विकास मध्यकाल की दरबारी संस्कृति से हुआ.
मुगल और नवाबी शासनकाल के दौरान कायस्थ समुदाय प्रशासनिक सेवाओं में अग्रणी था. उन्होंने नवाबों के साथ मिलकर एक साझा संस्कृति विकसित की, जहां होली के ‘हुड़दंग’ के बाद पड़वा के दिन भारी दावतों का आयोजन होता था.
अवध के इतिहासकार बताते हैं कि रंगों की थकान उतारने और सामाजिक मेलजोल बढ़ाने के लिए मटन करी और कबाब इस दिन के मुख्य व्यंजन बन गए. यहां तक कि शाकाहारी परिवारों में भी इस दिन ‘कटहल’ को ‘वेज मीट’ के रूप में पकाने की परंपरा इसी प्रभाव का हिस्सा है.
शाक्त परंपरा और तांत्रिक आधार: ‘बलि’ का रूपांतरण
पूर्वी भारत (बंगाल, असम, बिहार) में इसका अलग स्वरूप देखने मिलता है. होली को ‘होलिका दहन‘ यानी बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में मनाया जाता है. शाक्त मत (Shakta Tradition) के अनुसार, ऐसी किसी भी बड़ी विजय का उत्सव ‘बलि’ के बिना अधूरा माना जाता था. प्राचीन काल में देवी मंदिरों में बलि चढ़ाई जाती थी, जिसका मांस ‘महाप्रसाद’ के रूप में भक्तों में वितरित होता था.
ऋतु परिवर्तन और स्वास्थ्य: एक ‘देसी’ वैज्ञानिक दृष्टिकोण
होली का समय ठंड की विदाई और गर्मी के आगमन का ‘ट्रांजिशन फेज’ होता है. इस दौरान शरीर की जठराग्नि (Digestive Fire) में बदलाव आते हैं. होली के दिन रंगों और पानी में भीगने के कारण शरीर की ऊर्जा का अत्यधिक क्षय होता है. स्थानीय लोग मानते हैं कि गरम मसालों (काली मिर्च, लौंग, दालचीनी) के साथ पका हुआ मांस शरीर को तत्काल ‘गर्मी’ और ‘प्रोटीन’ प्रदान करता है.
चूंकि होली के अगले दिन खेती या व्यापार से छुट्टी होती है, इसलिए ‘पड़वा’ का दिन समुदाय के साथ मिलकर मांस पकाने और खाने के लिए सबसे उपयुक्त माना गया.
सनातन धर्म के वैदिक साहित्य (वेद, उपनिषद) में त्योहारों पर मांस का कोई जिक्र इस तरह से नहीं मिलता है. यह पूरी तरह से एक ‘लोकाचार’ है. भारतीय संस्कृति की खूबसूरती यही है कि यहां ‘शास्त्र’ (Scriptures) और ‘लोक’ (Folklore) साथ-साथ चलते हैं. पड़वा पर मांसाहार एक ‘सांस्कृतिक चुनाव’ है, न कि ‘धार्मिक मजबूरी’.
एक अनूठी सांस्कृतिक विरासत
होली की पड़वा पर नॉनवेज खाने की परंपरा भारत की उस ‘विविधता में एकता’ का प्रतिबिंब है, जहां राजपूतों का शौर्य, नवाबों का जायका और किसानों की सामूहिकता एक थाली में सिमट आती है. 4 मार्च 2026 की प्रतिपदा तिथि हमें याद दिलाती है कि हमारे त्योहार केवल कैलेंडर की तारीखें नहीं, बल्कि सदियों पुरानी ऐतिहासिक यादों का जीवंत रूप हैं.
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