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Dharmendra Superhit Movies : ‘ही मैन’ के नाम से मशहूर, हर दिल अजीज बॉलीवुड सुपरस्टार धर्मेंद्र ने अपने करियर में 300 से ज्यादा फिल्मों में काम किया. उन्होंने अपने जमाने की इंडस्ट्री की हर बड़ी हीरोइन के साथ काम किया. बॉलीवुड की एक हीरोइन के साथ उन्होंने करीब 10 फिल्मों में काम किया. इनमें से 3 फिल्में खूब सराही गईं. इन तीन फिल्मों में से दो फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर खूब धमाल मचाया. तीसरी फिल्म को धर्मेंद्र की सबसे बेस्ट फिल्म माना जाता है. सबसे दिलचस्प बात यह है कि धर्मेंद्र इस हीरोइन को शूटिंग के दौरान डर्टी जोक्स सुनाया करते थे. वो हीरोइन कौन थी, वो 3 फिल्में कौन सी थीं, आइये जानते हैं……
धर्मेंद्र ने 60 के दशक में बॉलीवुड में ‘दिल भी तेरा, हम भी तेरे’ से एंट्री ली थी. इस फिल्म का डायरेक्शन अर्जुन हिंगोरानी ने किया था. इसके लिए उन्हें ₹51 का चेक मिला था. 1966 में शर्मिला टैगोर संग उनकी जोड़ी खूब पसंद की गई. फिल्म थी अनुपमा. दोनों ने करीब 10 फिल्मों में काम किया था. धर्मेंद्र-शर्मिला टैगोर ने देवर (1966), मेरे हमदम मेरे दोस्त (1968), यकीन (1969) जैसी फिल्मों में साथ में काम किया. फिर तीन ऐसी फिल्में आईं जिन्होंने दर्शकों ने सबसे ज्यादा पसंद किया. ये फिल्में थीं : सत्यकाम (1969), चुपके चुपके (1975) और एक महल को सपनों का (1975). शर्मिला टैगोर ने कपिल शर्मा के शो में धर्मेंद्र की पर्सनल लाइफ से जुड़े कई दिलचस्प खुलासे किए थे.

शर्मिला टैगोर ने कपिल शर्मा के शो में बताया था कि धर्मेंद्र दिल के बहुत इंसान थे. दोनों की खूब जमती थी. धर्मेंद्र सेट पर डर्टी जोक्स सुनाया करते थे. एक्ट्रेस ने कहा था, ‘मुझे सभी एक्टर्स के साथ काम करना पसंद था. शशि कपूर से लेकर धर्मेंद्र तक. धरम जी और मेरा बर्थडे सेम डेट को था लेकिन साल अलग-अलग थे. वो दिल के बहुत अच्छे इंसान थे. वो सेट पर बहुत ही डर्टी जोक्स सुनाया करते थे पर उनके साथ बहुत ही मजा आया करता था. मेरे फेवरेट हीरो संजीव कुमार (हरि भाई) थे.’

धर्मेंद्र-शर्मिला टैगोर की सबसे खास फिल्म ‘सत्यकाम’ थी जो कि 1969 में रिलीज हुई थी. धर्मेंद्र, अशोक कुमार, शर्मिला टैगोर और संजीव कुमार लीड रोल में थे. कहानी ‘सत्यनाम’ के बंगाली उपन्यास पर बेस्ड थी. इस उपन्यास के लेखक नारायण सन्याल थे. फिल्म का नाम प्राचीन संत सत्यकाम जबाला से इंस्पायर्ड होकर रखा गया था. सच-झूठ, न्याय-अन्याय की लड़ाई के बीच यह फिल्म उम्मीद जगाती है. फिल्म में एक ऐसे युवक की कहानी है जो ईमानदारी से समझौता नहीं करता. हृषिकेश मुखर्जी के निर्देशन में बनी इस फिल्म के प्रोड्यूसर शेर जंग सिंह पंछी थे जो कि रिश्ते में धर्मेंद्र के बहनोई ह्ते. म्यूजिक लक्ष्मीकांत प्यारेलाल का था. गीतकार कैफी आजमी थे. स्क्रीनप्ले विमल दत्ता ने लिखा था. डायलॉग्स रजिंदर सिंह बेदी ने लिखे थे.
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सत्यकाम फिल्म बॉक्स ऑफिस पर कुछ खास कमाल तो नहीं दिखा सकी लेकिन लेकिन ऋषिकेश मुखर्जी को इसके लिए नेशनल अवॉर्ड मिला था. फिल्मो को हिंदी में सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला था. धर्मेंद्र की एक्टिंग और कहानी को बहुत सराहा गया. यह फिल्म आज कल्ट क्लासिक फिल्मों में शुमार है. ‘सत्यकाम’ फिल्म में धर्मेंद्र ने जिस तरह की एक्टिंग की, वो उनके करियर में सबसे बेस्ट है. इससे ज्यादा गंभीर अभिनय उन्होंने फिर कभी नहीं किया. सत्यकाम फिल्म के कई सीन्स-डायलॉग रोंगटे खड़े कर देने वाले थे. शर्मिला टैगोर- रोबी घोष का काम बहुत अच्छा था. धर्मेंद्र ने अपने कैरेक्टर को जीवंत कर दिया था.

1975 का साल बॉलीवुड के लिए गोल्डन वर्ष साबित हुआ. इस साल शोले-दीवार-धर्मात्मा और प्रतिज्ञा जैसी फिल्में आईं, जिन्होंने हिंदी सिनेमा का रुख बदल दिया. इसी साल अप्रैल 1975 में रिलीज हुई रोमांटिक कॉमेडी फिल्म ‘चुपके-चुपके’ की जिसका डायरेक्शन हृषिकेश मुखर्जी ने किया था. फिल्म में धर्मेंद्र-शर्मिला टैगोर, अमिताभ बच्चन-जया भादुड़ी जैसे सितारे नजर आए थे. फिल्म बंगाली फिल्म ‘छद्मबेषी’ का रीमेक थी जिसमें उत्तर कुमार नजर आए थे. एसडी बर्मन ने फिल्म का म्यूजिक कंपोज किया था. ‘अब के साजन सावन में’ जैसा सदाबहार गाना शर्मिला टैगोर पर फिल्माया गया था.

‘चुपके-चुपके’ फिल्म से एक दिलचस्प किस्सा जुड़ा हुआ है. इस फिल्म के डायरेक्टर हृषिकेश मुखर्जी किसी न्यूकमर को लेना चाहते थे. हृषिकेश मुखर्जी का अमिताभ के करियर में अहम योगदान रहा है. जैसे ही अमिताभ बच्चन और जया भादुड़ी को इसका पता चला तो दोनों उनके पास पहुंचे और फ्री में फिल्म में काम करने का ऑफर दिया. हृषिकेश मुखर्जी ने कहा कि रोल बहुत छोटा है, फिर भी दोनों ने इसे स्वीकार कर लिया. जया बच्चन इस फिल्म की शूटिंग के दौरान प्रेग्नेंट थीं, इसलिए उनके क्लोज-अप शॉट नहीं दिखाए गए. ‘चुपके-चुपके’ ब्लॉकबस्टर फिल्म साबित हुई थी.

अब बात 9 जुलाई 1975 को रिलीज हुई फिल्म ‘एक हो महल हो सपनों का’ की बात करते हैं. फिल्म में धर्मेंद्र,-शर्मिला टैगोर और लीना चंदावरकर के बीच लव ट्रायंगल था. तीनों ही लीड रोल में थे. अशोक कुमार-देवेन वर्मा ने सपोर्टिंग रोल में खूब वाहवाही बटोरी थी. रवि ने ही फिल्म का म्यूजिक कंपोज किया था. फिल्म के गाने साहिर लुधियानवी ने लिखे थे. कहानी-स्क्रीनप्ले मुश्ताक जलीली ने लिखा था. डायलॉग मुश्ताक जलीली और डॉ. बालकृष्ण ने लिखे थे. फिल्म के डायरेक्टर-प्रोड्यूसर देवेंद्र गोयल थे.

इस फिल्म का सबसे मजेदार किस्सा यह है कि धर्मेंद्र चाहते थे कि उन पर फिल्माये जाने वाले गाने मोहम्मद रफी गाएं. इधर डायरेक्टर-प्रोड्यूसर देवेंद्र गोयल को किशोर कुमार पसंद थे. उन्होंने फिल्म के तीन गाने ‘देखा है जिंदगी को, इतना करीब से, ‘हमसे पूछो कि हकीकत क्या है’ और तीसरा गीत ‘दिल में किसी के प्यार का’ किशोर कुमार से रिकॉर्ड करवाए. जब बारी फिल्म के टाइटल की आई तो संगीतकार रवि ने मोहम्मद रफी का नाम सुझाया लेकिन देवेंद्र गोयल नहीं माने. किशोर कुमार- लता मंगेशकर की आवाज में फिल्म का टाइटल रिकॉर्ड हो गया. दूसरे दिन डायरेक्टर देवेंद्र गोयल खुद संगीतकार रवि के पास पहुंचे. टाइटल सॉन्ग ‘एक महल हो सपनों का’ को रफी साहब से रिकॉर्ड करवाने की बात कही. इसी गाने ने इतिहास रच दिया. फिल्म मैसिव हिट रही.
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