अमेरिका-इस्राइल का ईरान के खिलाफ बीते 28 फरवरी से शुरू हुआ युद्ध किसी निष्कर्ष पर पहुंचता नहीं दिख रहा है। पश्चिम एशिया के हालात तनावपूर्ण हैं। एकदूसरे के खिलाफ मिसाइलें दागी जा रही हैं। लोगों की जानें जा रही हैं। ईरान की कमान अब नए सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई के हाथों में हैं। इस बीच बड़ा सवाल यह है कि इस युद्ध में ईरान का रुख क्या है? उसकी रणनीति क्या है और वह क्या चाहता है? इन सवालों के जवाब जानने के लिए अमर उजाला के विनोद अग्निहोत्री ने ईरान के सर्वोच्च नेता के भारत में विशेष प्रतिनिधि अयातुल्लाह हाकिम अली इलाही से खास बातचीत की।
इस युद्ध के बारे में क्या कहेंगे?
हम भारत में हमारे सभी भाई-बहनों के प्रति शुक्रगुजार हैं क्योंकि उन्होंने हमदर्दी दिखाई। दरअसल, हमने यह युद्ध शुरू नहीं किया। हम यह जंग नहीं चाहते थे। हमने अपनी ओर से हरसंभव प्रयास किया कि हमारे क्षेत्र में यह युद्ध न हो। बातचीत में कई उपलब्धियां हासिल हुई थीं। हमें लगा था कि एक अच्छा समझौता होगा और यह युद्ध कभी शुरू नहीं होगा, लेकिन दुर्भाग्यवश उन्होंने ही इस युद्ध की शुरुआत की। उन्होंने यह युद्ध ईरान पर थोपा है। युद्ध का असर केवल ईरानियों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक वैश्विक संकट बन चुका है। दुनियाभर के लोग इससे प्रभावित हो रहे हैं। गैस, कच्चा तेल, पेट्रोल और खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ गई हैं। हमने अपने सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई को खो दिया। हमने अपने कई नेताओं और कमांडरों को भी खोया है और अब हमें अपनी रक्षा करनी है।
यह युद्ध आखिर कब तक चलेगा?
मुझे नहीं पता कि यह युद्ध कितने समय तक चलेगा, लेकिन हम इसे जल्द से जल्द समाप्त करने के लिए तैयार हैं। हम नहीं चाहते कि यह युद्ध जारी रहे, लेकिन हमारी कुछ शर्तें हैं, जिनका उल्लेख हमारे राष्ट्रपति ने भी किया है। अगर वे समझौते के लिए आगे नहीं आते हैं, तो हम युद्ध जारी रखने के लिए भी तैयार हैं। हम मजबूत स्थिति में हैं। हमारे पास इतनी शक्ति है कि हम इस युद्ध को दो-तीन साल से अधिक समय तक भी जारी रख सकते हैं। हमारे पास युद्ध का अनुभव भी है। हमने आठ साल तक युद्ध झेला है। इस दौरान बहुत अनुभव हासिल भी किया है। हमारे लोग भी इसके लिए तैयार हैं।
इस युद्ध से आखिर फायदा किसे है?
अब भी हम युद्ध नहीं चाहते क्योंकि बहुत से लोग इससे पीड़ित हैं, खासकर हमारे पड़ोसी देशों के लोग। ये जो कुछ हो रहा है, उससे हम खुश नहीं हैं, लेकिन हमारे पास कोई और विकल्प भी नहीं है। कुछ लोग यह भी कह रहे हैं कि उनके पास ईरान के सर्वोच्च नेता को चुनने का अधिकार होना चाहिए। यह कैसी सोच है कि किसी स्वतंत्र देश पर यह थोपा जाए कि हम आपके नेता का चुनाव करेंगे। उन्होंने अलग-अलग जगहों पर यह भी कहा कि हमें ईरान का बिना शर्त आत्मसमर्पण चाहिए। इसका मतलब सारा तेल, गैस, पेट्रोल, खनिज और संपत्ति उनके नियंत्रण में चली जाएगी। हम हजारों वर्षों से अपने पड़ोसियों के साथ इस क्षेत्र में रह रहे हैं। उस समय अमेरिका का अस्तित्व भी नहीं था। अमेरिका कितना पुराना है? 200 या 250 साल? लेकिन हम यहां सदियों से रह रहे हैं और आज हमें चारों तरफ से अमेरिका ने अपने सैन्य ठिकानों के जरिए घेर रखा है।
पड़ोसी देशों से आप क्या कहना चाहेंगे?
हमारे पड़ोसी देशों ने दशकों तक हमारे दुश्मन को अपनी जमीन, सुविधाएं और सैन्य ठिकाने क्यों दिए? ताकि वे आकर हम पर हमला करें? वे जानते हैं कि अमेरिका इन ठिकानों का इस्तेमाल क्यों करता है। हमने उन्हें कई बार चेतावनी दी कि वे आपकी जमीन का इस्तेमाल आपकी सुरक्षा के लिए नहीं कर रहे, बल्कि दूसरे देशों पर हमला करने के लिए कर रहे हैं और एक दिन आपकी बारी भी आएगी। अब हमारे सभी पड़ोसी समझ चुके हैं कि ये ठिकाने उन्हें सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं देते। हम युद्ध को जारी नहीं रखना चाहते। हम नहीं चाहते कि इस धरती पर खून की एक बूंद भी गिरे, लेकिन हम क्या कर सकते हैं? अगर हम चुप रहें और अपनी रक्षा न करें, तो वो हमें खत्म कर देंगे।
सर्वोच्च नेता को खो देने के बाद भी ईरान कैसे इस युद्ध में टिका है?
ईरान की व्यवस्था किसी एक व्यक्ति या व्यक्तिगत प्रणाली पर आधारित नहीं है। यहां तक कि नेतृत्व भी व्यक्तिगत नहीं है। यह एक संवैधानिक और संस्थागत प्रणाली है। हमारे पास एक स्थापित व्यवस्था है। किसी एक व्यक्ति को मार देने से यह प्रणाली खत्म नहीं होती। सिर्फ वह व्यक्ति चला जाएगा और उसकी जगह कोई दूसरा आ जाएगा। अगर वे किसी एक पद पर पहले नेता को भी खत्म कर दें तो दूसरा आएगा, फिर तीसरा, चौथा, पांचवां और यह क्रम चलता रहेगा। यह उनकी योजना, उनके सपने और उनकी कल्पना थी कि तीन दिनों के भीतर सब कुछ ढह जाएगा। अगर वे ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई को निशाना बनाएंगे, तो सब कुछ खत्म हो जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। हमें यकीन है कि वे कुछ भी हासिल नहीं कर पाएंगे, लेकिन इस प्रक्रिया में नुकसान दोनों पक्षों को होगा, क्योंकि यह युद्ध बहुत महंगा है और इसकी कीमत उन्हें भी चुकानी पड़ेगी।
भारत से रिश्तों पर क्या कहेंगे?
ईरान-भारत का नाता लगभग 7000 वर्षों से है। ईरानी और भारतीय लोग आध्यात्मिकता, संस्कृति, शिक्षा, सभ्यता और दर्शन के माध्यम से एक-दूसरे से जुड़े रहे हैं। मैंने भारतीय दर्शन के बारे में काफी पढ़ा और अध्ययन किया है। हमें अपने विश्वविद्यालयों में भारतीय दर्शन भी पढ़ाया जाता था और हमने भारत की दर्शन परंपरा का अध्ययन किया है। हमारे संबंध पहले से ही बहुत मजबूत रहे हैं और आज भी उतने ही मजबूत हैं। ये संबंध कई क्षेत्रों अर्थव्यवस्था, राजनीति और शिक्षा में फैले हुए हैं। कई ईरानी छात्र भारतीय विश्वविद्यालयों में पढ़ते रहे हैं और वर्तमान में भी बहुत से भारतीय छात्र ईरान के विश्वविद्यालयों में अध्ययन कर रहे हैं। हम भारत के अपने भाइयों और बहनों के आभारी हैं, जिन्होंने हमेशा अच्छा साथ दिया है। भारत न्याय की भूमि है, सम्मान की भूमि है, मानवता और नैतिकता की भूमि है, और यह उत्पीड़ित लोगों की आवाज उठाने वाला देश है। हमें उम्मीद है कि यह भावना आगे भी बनी रहेगी और हमारे बीच आपसी सहयोग और भी मजबूत होगा।
दुनिया के देशों के लिए आपका क्या संदेश है?
दुनिया के सभी नेता इस युद्ध को समाप्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। उन्हें एकजुट होकर आगे आना चाहिए और निर्दोष लोगों के खून-खराबे को रोकना चाहिए। हम उम्मीद करते हैं कि दुनिया के सभी नेता, जो न्याय, मानवता और मानव जीवन की रक्षा के प्रति संवेदनशील हैं, वे एक साथ आएं, एकजुट हों और इस अन्यायपूर्ण युद्ध को रोकें। हर व्यक्ति और हर देश इस युद्ध को समाप्त करने में एक सकारात्मक और महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
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