धनबाद/संजय गुप्ता. हिंदी फिल्म जगत के दिग्गज अभिनेता और ही-मैन के नाम से विख्यात धर्मेंद्र अब हमारे बीच नहीं रहे. देशभर में उनके प्रशंसक भावुक उनके निधन के कई दिन बीत जाने के बाद भी भावुक हैं.धनबाद में यह दुख लोगों की आंखों तक नहीं, दिलों तक उतर आया है. झारखंड के कोयलांचल धनबाद के लोग भी शोकाकुल हैं, क्योंकि धर्मेंद्र का इस क्षेत्र से पुराना और भावनात्मक रिश्ता रहा है. वर्ष 1966 में बनी फिल्म ‘मोहब्बत जिंदगी है’ की शूटिंग धनबाद के तोपचांची झील में हुई थी, जहां धर्मेंद्र कई सप्ताह तक ठहरे थे. उनके आने की यादें आज भी स्थानीय लोगों के लिए गर्व और भावना का हिस्सा हैं. भले ही उस समय वह सुपरस्टार नहीं बने थे, लेकिन उनकी सादगी, मुस्कान और लोगों के साथ घुलने-मिलने के अंदाज ने उन्हें कोयलांचल के लोगों के दिल में हमेशा के लिए जगह दे दी.
तोपचांची झील… जहां धर्मेंद्र ने बिताए थे यादगार दिन
धर्मेंद्र के निधन पर धनबाद के लोग भावुक, तोपचांची झील से जुड़ी यादें और उनका सादगी भरा रिश्ता आज भी दिलों में जिंदा है.
लोगों की यादों में जिंदा हैं धर्मेंद्र उर्फ धरम जी, धरम पा
तोपचांची झील में काम करने वाले किशुन राय याद करते हुए बताते हैं- हम छोटे थे और लोग उन्हें देखने उमड़ पड़ते थे. वह हंसमुख और लोगों से जुड़ने वाले इंसान थे. लेक हाउस में उनके लिए खाना बनता था और कई बार हमने उन्हें भोजन परोसा भी है. वहीं, चाय दुकान चलाने वाले द्वारिका प्रसाद महतो कहते हैं- मेरे चाचा जगलाल महतो ने फिल्म में एक सीन किया था. धर्मेंद्र जमीन से जुड़े कलाकार थे, बड़े स्टार थे लेकिन दिल बहुत सादगी भरा था.

तोपचांची झील के पास स्थित मशहूर लेक गेस्ट हाउस ‘52 कोठी 53 द्वार’ में धर्मेंद्र ठहरे थे.
धनबाद के स्थानीय लोगों में गम और गर्व का भाव

चाय दुकान चलाने वाले द्वारिका प्रसाद महतो धर्मेंद्र की यादों को अपने चाचा जगलाल महतो को स्मरण कर उसमें खो जाते हैं.
फिल्मों ने दी पहचान, यादों ने दिलों में जगह बनाई
बता दें कि धर्मेंद्र ने अपने करियर में शोले, सीता और गीता, मेरा गांव मेरा देश, धर्म-वीर, चुपके-चुपके जैसी सुपरहिट फिल्में दीं. लेकिन, तोपचांची के लोगों के लिए वह सिर्फ बड़े पर्दे के हीरो नहीं, बल्कि मुस्कुराने वाले, घूमने वाले और बातचीत करने वाले इंसान थे. धर्मेंद्र का निधन उनके चाहने वालों के लिए एक युग का अंत माना जा रहा है. धनबाद में लोगों ने उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए कहा- उन्होंने सिर्फ फिल्में नहीं दीं, यादें दीं. धर्मेंद्र अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन तोपचांची झील के हर पानी की लहर, हर पेड़ की छाया और हर बुजुर्ग चेहरे की स्मृतियों में उनकी मुस्कान दर्ज है.

तोपचांची के रहने वाले मो. नोशाद अंसारी भावुक होते हुए धर्मेंद्र को याद करते हैं.
तोपचांची झील में आज भी जिंदा हैं धर्मेंद्र की यादें
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