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Hrishikesh Mukherjee Best Movies : बॉलीवुड के कई डायरेक्टर-प्रोड्यूसर कम बजट की सार्थक फिल्में बनाने के लिए जाने जाते रहे हैं. 70 के दशक में 6 साल के अंतराल में ऐसी ही 4 फिल्में सिनेमाघरों में आई थीं. चार फिल्मों का निर्देशन एक ही डायरेक्टर ने किया था. तीन फिल्मों में डायरेक्टर-एक्टर की जोड़ी सेम थी. इन चार फिल्मों में से दो फिल्मों ने नेशनल अवॉर्ड भी जीते. एक फिल्म की गिनती तो कल्ट क्लासिक मूवी में होती है. हिंदी सिनेमा के इतिहास की मस्ट वॉच लिस्ट में शामिल हैं. ये चारों फिल्में कौन सी हैं, जो हर जनरेशन के दिलों पर आज भी राज कर रही हैं.
कुछ फिल्में ऐसी होती हैं जो दिल में हमेशा के लिए बसेरा बना लेती हैं. ऐसी फिल्में समय-काल के बंधन को तोड़ देती हैं. दिलचस्प तथ्य यह है कि हिंदी सिनेमा के इतिहास में ऐसी फिल्में हमेशा कम बजट में ही बनाई गईं. 70 के दशक में ऐसी ही चार फिल्में रिलीज हुई थीं. बिना विलेन के साथ-सुथरी और हल्के-फुल्के अंदाज में हर दर्शक को जोड़ लेनी कहानी के साथ ये फिल्में आज भी गुदगुदाती हैं. कुछ तो आज भी दर्शकों के दिल को झकझोर देती हैं. मजेदार बात यह है कि इन चारों फिल्मों के डायरेक्टर हृषिकेश मुखर्जी थे. तीन फिल्मों में धर्मेंद्र ने उनके साथ काम किया. एक फिल्म में अमिताभ बच्चन-राजेश खन्ना साथ में नजर आए थे. दो फिल्मों को नेशनल अवॉर्ड भी मिला था. तीन फिल्में हिट रही थीं. ये फिल्में थीं : सत्यकाम, आनंद, गुड्डी और चुपके-चुपके. आइये जानते हैं इन चारों फिल्मों से जुड़े दिलचस्प तथ्य………

सबसे पहले बात करते हैं 1969 में आई सत्यकाम फिल्म की जिसमें धर्मेंद्र, अशोक कुमार, शर्मिला टैगोर और संजीव कुमार लीड रोल में थे. फिल्म की कहानी इसी नाम के बंगाली उपन्यास पर आधारित थी जिसे नारायण सन्याल ने लिखा था. फिल्म का नाम प्राचीन संत सत्यकाम जबाला से इंस्पायर्ड होकर रखा गया था. सच-झूठ, न्याय-अन्याय की लड़ाई के बीच उम्मीद जगाती यह फिल्म एक ऐसे युवक की कहानी है जो ईमानदारी से समझौता नहीं करता. सत्यकाम का निर्देशन हृषिकेश मुखर्जी ने किया था. प्रोड्यूसर शेर जंग सिंह पंछी थे. म्यूजिक लक्ष्मीकांत प्यारेलाल का था. गीतकार कैफी आजमी थे. स्क्रीनप्ले विमल दत्ता ने लिखा था. दिल को छू लेने वाले डायलॉग्स रजिंदर सिंह बेदी ने लिखे थे.

सत्यकाम धर्मेंद्र के करियर की सबसे बेस्ट फिल्म मानी जाती है. उन्होंने अपने पूरे करियर में सबसे गंभीर अभिनय सत्यकाम में किया. फिल्म के कई सीन्स तो कई डायलॉग रोंगटे खड़े कर देने वाले थे. शर्मिला टैगोर- रोबी घोष का काम बहुत अच्छा था. धर्मेंद्र ने अपने कैरेक्टर को जीवंत कर दिया था. फिल्म बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप रही थी लेकिन ऋषिकेश मुखर्जी को इसके लिए नेशनल अवॉर्ड मिला था. फिल्मो को हिंदी में सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला था. धर्मेंद्र की एक्टिंग और कहानी को बहुत सराहा गया. यह फिल्म आज कल्ट क्लासिक फिल्मों में शुमार है.
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सत्यकाम की रिलीज के दो साल बाद हृषिकेश मुखर्जी की एक ऐसी फिल्म रुपहले पर्दे पर आई जो हिंदी सिनेमा के इतिहास की कालजयी फिल्म मानी जाती है. फिल्म का डायलॉग ‘बाबू मोशाय! जिंदगी एक रंगमंच है और हम सब इस रंगमंच पर कठपुतलियां हैं, हम सबकी डोर ऊपर वाले के हाथ में है, कब किसकी डोर खिंच जाए, कोई नहीं जानता’ हमेशा-हमेशा के लिए अमर हो गया. फिल्म इंसान की क्षणिक जिंदगी को बखूबी बताती है. जी हां बात हो रही हैं राजेश खन्ना-अमिताभ बच्चन के करियर की सार्वकालिक महान फिल्म आनंद की जो कि 12 मार्च 1971 को रिलीज हुई थी. यह मूवी 100 मस्ट वॉच लिस्ट में शामिल है. हर किसी को यह फिल्म में जीवन में एक बार जरूर देखनी चाहिए. प्रोड्यूसर एनसी सिप्पी थे.

आनंद फिल्म में राजेश खन्ना, अमिताभ बच्चन, सुमित सन्याल और रमेश देव लीड रोल में थे. म्यूजिक सलिल चौधरी का था. गीतकार गुलजार-योगेश गौड़ थे. फिल्म में 16: 28 मिनट की लेंग्थ के पांच गाने थे. हर गाना दिल को छू लेने वाला था. फिल्म के तीन गाने ‘कहीं दूर जब दिन ढल जाए, मैंने तेरे लिए ही सात रंग के सपने चुने, जिंदगी कैसे है पहेली हाय’ बहुत पॉप्युलर हुए थे. इन गानों में छायावाद की झलक दिखाई पड़ती है. गीतकार योगेश गौड़ ने अपने एक इंटरव्यू में बताया था कि उन्होंने आनंद फिल्म के गाने अपनी निजी जिंदगी के अनुभवों के आधार पर लिखे थे.

आनंद फिल्म की कहानी दोस्ती, निश्चल प्रेम, जिंदगी को हर पल को खुशनुमा अंदाज में जीने की सीख देती है. गुलजार और हृषिकेश मुखर्जी ने मिलकर स्क्रिप्ट लिखी थी. यह कहानी राज कपूर और हृषिकेश मुखर्जी की दोस्ती-जिंदगी से इंस्पायर्ड थी. राज कपूर प्यार से उन्हें ‘बाबू मोशाय’ बोला करते थे. यही दो शब्द आनंद फिल्म की पहचान बन गए. राज कपूर 1969 में बहुत ज्यादा बीमार पड़ गए थे. हृषिकेश दा ने इस दौरान जो दर्द को महसूस किया, उसे ही फिल्म के जरिये दर्शकों के सामने पेश किया. 30 लाख के बजट में बनी आनंद फिल्म ने करीब 1 करोड़ रुपये का कलेक्शन किया था. राजेश खन्ना ने सिर्फ 7 लाख रुपये फीस ली थी. इस फिल्म ने अमिताभ बच्चन को फिल्म इंडस्ट्री में पहचान दी. फिल्म की रिलीज से पहले अमिताभ बच्चन एक पेट्रोल पंप पर पेट्रोल भरवाने गए थे तब उन्हें किसी ने नहीं पहचाना था लेकिन मूवी के रिलीज के बाद उन्हें लोग पहचानने लगे थे. इस बात का खुलासा खुद बिग बी ने किया था.

1971 में ही हृषिकेश मुखर्जी के निर्देशन में बनी एक और फिल्म गुड्डी आई थी जिसमें धर्मेंद्र, जया भादुड़ी और उत्पल दत्त, एके हंगल और असरानी नजर आए थे. फिल्म की कहानी गुलज़ार ने लिखी थी. म्यूजि वसंत देसाई और सलिल चौधरी का था. फिल्म में अमिताभ बच्चन का कैमियो था. राजेश खन्ना, नवीन निश्चल, विनोद खन्ना, ओम प्रकाश और प्राण जैसे कई बॉलीवुड सितारे गेस्ट रोल में थे. जया बच्चन की यह डेब्यू फिल्म थी. जया ने एक स्कूली छात्रा का किरदार निभाया था. यह फिल्म वास्तविक जीवन और पर्दे के बीच के अंतर को बखूबी दिखाती है. फिल्म इंडस्ट्री की चकाचौंध भरी दुनिया की सच्चाई को उजागर करती है. यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर हिट रही थी. इस फिल्म का रीमेक तमिल में भी बनाया गया था.

1975 का नाम लेते ही शोले फिल्म के दृश्य मन-मस्तिष्क में उभरने लगते हैं. 1975 में ही हृषिकेश मुखर्जी की एक फिल्म आई थी जिसमें अमिताभ बच्चन-धर्मेंद्र की जोड़ी साथ में नजर आई थी. मजेदार बात यह है कि शोले फिल्म में भी दोनों की जोड़ी थी. इस फिल्म के डायरेक्टर-प्रोड्यूसर हृषिकेश मुखर्जी ही थे. फिल्म में जया बच्चन, शर्मिला टैगोर और ओम प्रकाश लीड रोल में थे. म्यूजिक एसडी बर्मन का था. गीत आनंद बख्शी ने लिखे थे. यह एक रोमांटिक-कॉमेडी फिल्म थी. फिल्म में 17:25 मिनट की लेंग्थ के कुल चार गाने थे. फिल्म का एक गाना ‘अबके बरस सावन में..’ आज भी उतना ही पॉप्युलर है. यह 1971 में आई एक बंगाली फिल्म ‘छद्मबेशी’ का रीमेक थी. फिल्म की कहानी उपेंद्रनाथ गांगुली की थी. स्क्रीनप्ले डीएन मुखर्जी और गुलजार ने तैयार किया था. डायलॉग्स गुलजार ने लिखे थे. यह एक सुपरहिट फिल्म साबित हुई थी.
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