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Anand movie Rajesh Khanna: बॉलीवुड में कुछ फिल्में ऐसी भी हैं जिसमें गीतकार ने अपने जीवन का दर्द गीतों में डाल दिया हो. इन गीतों ने फिल्म की कहानी को और गति दी है. करीब 53 साल पहले एक ऐसी ही फिल्म बॉक्स ऑफिस में रिलीज हुई थी जिसे आज भी हर पीढ़ी पसंद करती है. इस फिल्म को देखने के लिए मुंबई के कॉलेज खाली हो गए थे. इस मूवी में जीवन को हंसकर जीने की कला दिखाई गई है. यह कला हर दर्शक के दिल में घर कर जाती है. आज यह फिल्म क्ल्ट क्लासिक मानी जाती है. फिल्म का क्लाइमैक्स भी उतना ही मार्मिक अंदाज में दिखाया गया था. फिल्ममेकर ने इस मूवी को अपने जिगरी दोस्त की जिंदगी पर बनाया था.
12 मार्च 1971 को राजेश खन्ना की एक ऐसी फिल्म रिलीज हुई थी जिसमे डायलॉग को वो पूरी जिंदगी सार्वजनिक मंच पर दोहराते रहे. हर किसी को इस फिल्म को जीवन में एक बार जरूर देखने की सलाह दी जाती है. डायरेक्टर हृषिकेश मुखर्जी और प्रोड्यूसर एनसी सिप्पी की यह फिल्म थी जिसका नाम है : आनंद.

आनंद फिल्म की कहानी दोस्ती, प्यार, निश्चल प्रेम, जिंदगी को हर पल को खुशनुमा अंदाज में जीने के बारे में है. स्क्रिप्ट गुलजार और हृषिकेश मुखर्जी ने मिलकर लिखी थी. यह फिल्म डायरेक्टर और उसके दोस्त की जिंदगी से प्रेरित थी. गाने गीतकार की निजी जिंदगी से जुड़े हुए थे.

आनंद फिल्म में राजेश खन्ना, अमिताभ बच्चन, जॉनी वॉकर, सुमिता सान्याल जहां लीड रोल में थे, वहीं दारा सिंह ने एक कैमियो किया था. सलिल चौधरी के संगीत निर्देशन में बने दो गाने योगेश गौड़ ने लिखे थे. आज यह फिल्म मस्ट वॉच मूवी की लिस्ट में शामिल है. फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सुपर हिट रही थी.

योगेश गौड़ ने अपने एक इंटरव्यू में फिल्म के गाने के पीछे की सच्चाई के बारे में बताया था. फिल्म का म्यूजिक बहुत सुपरहिट रहा था. इसमें 16 मिनट के 5 गाने थे. फिल्म के सबसे मकबूल गाने थे : ‘कहीं दूर जब दिन ढल जाए…’, ‘मैंने तेरे लिए ही..’ , ‘जिंदगी कैसे है पहेली हाय’. दो गाने ‘कहीं दूर जब दिन ढल जाए…’ और ‘जिंदगी कैसे है पहेली हाय’गीतकार योगेश गौड़ ने लिखे थे. आनंदि फिल्म को 8 अवॉर्ड मिले थे.

गीतकार योगेश गौड़ लखनऊ के रहने वाले थे. जब 12वीं कक्षा में थे तो उनके पिता का निधन हो गया. शॉर्ट हैंड टाइप राइटिंग सीखी लेकिन नौकरी नहीं मिली. काम की तलाश में अपने दोस्त सत्य प्रकाश तिवारी उर्फ सत्तू के साथ मुंबई आ गए. मुंबई में योगेश गौड़ की सगी बुआ के लड़के फिल्म लाइन में थे. डायलॉग राइटर थे लेकिन उन्होंने कोई मदद नहीं की. 11 रुपये महीने पर एक पहाड़ी में कच्चा कमरा किराए पर लिया.

योगेश गौड़ बताते हैं, ‘मेरे दोस्त सत्तू ने मेरे लिए अपना जीवन लगा दिया. उसने कई फिल्म स्टूडियो के ऑफिस में चपरासी की नौकरी की, झाड़ू-पोछा किया. वो कहता था कि तुझे अपने भाई के सामने कुछ बनकर दिखाना है. फिर मैंने लिखना शुरू किया. उन्हीं दिनों मेरी मुलाकात गुलशन बावरा से हुई. फिर मैं संगीतकार रॉबिन बनर्जी से मिला. उन्होंने बताया कि ट्यून पर गाना लिखना है. इसी बीच मेरी मुलाकात लक्ष्मीकांत प्यारेलाल से हुई.’

योगेश ने बताया था, ‘मेरी मुलाकात किसी तरह सलिल चौधरी से हुई. वासु भट्टाचार्य से मुलाकात हुई. सलिल दा से उन्होंने तीन गाने मांगे थे. सलिल दा ने मुझसे गाने लिखवाए. वो फिल्म बंद हो गई लेकिन वो तीन गाने हृषिकेश मुखर्जी ने खरीद लिए. दो गाने मेरे सिलेक्ट हुए. इनमें से एक गाना था जहां से मुझे पहचान मिली, वो था : ‘कहीं दूर जब दिन ढल जाए..’ दूसरा गाना अन्नदाता फिल्म के लिए लिया गया. फिर तो काम मिलने का सिलसिला शुरू हो गया. उस समय कहानी होती थी और अगर कहानी जिंदगी की कहानी से मिल जाए तो दिल का दर्द अपने आप ही गाने में आ जाता है. मेरा सत्तू जैसा दोस्त था. जैसे आनंद की वो लाइन है जिसमें मैंने लिखा ‘कहीं तो दिल ये मिल नहीं पाते, कहीं तो निकल आएं जन्मों के नाते..’ ये लाइन ऐसे ही नहीं आई है. मेरी जिंदगी ऐसा हुआ है. जो अपने थे, वो पराए हो गए. मैंने कहीं पर लिखा था कि जब किसी साख से फूल बिखर जाते हैं, दर्द कांटों की तरह दिल में उभर आते हैं. उसमें एक शेर भी था ‘जो थे अपने, वो अपने, कभी न हुए अपने, अब कोई प्यार से मिलता तो डर जाते हैं. इस तरह की घटनाएं, विचार जो हमारी जिंदगी से जुड़े हुए हैं, या लोगों से जुड़े हुए हैं, तो लोगों को पसंद आते हैं.’

<br />हृषिकेश मुखर्जी ने यह फिल्म राज कपूर से प्रेरित होकर लिखी थी. राज कपूर प्यार से उन्हें ‘बाबू मोशाय’ बोला करते थे. ‘बाबू मोशाय’ बंगाली भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है ‘ग्रेट जेंटल मैन’. बाद में ये दो शब्द आनंद फिल्म की पहचान बन गए. राज कपूर एक बार 1969 में बहुत बीमार हो गए. उनके बीमार पड़ जाने के बाद हृषिकेश दा ने जिस दर्द को महसूस किया, उसे ही फिल्म के जरिये दर्शकों के सामने पेश किया. 30 लाख के बजट में बनी आनंद फिल्म ने करीब 1 करोड़ रुपये का कलेक्शन किया था. लो बजट की इस की कहानी सुनकर राजेश खन्ना द्रवित हो गए थे. उन्होंने सिर्फ 7 लाख रुपये फीस ली थी.
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