इलाहाबाद/एबीएन न्यूज। सार्वजनिक जन सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की है कि यदि कोई भवन जर्जर एवं खतरनाक स्थिति में पाया जाता है तो उसके ध्वस्तीकरण की कार्रवाई में किरायेदार बाधा नहीं बन सकते। ऐसी स्थिति में उन्हें भवन खाली करना अनिवार्य होगा।
यह आदेश न्यायमूर्ति नीरज तिवारी एवं न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद की खंडपीठ ने मुक्तेश्वर महादेव मुक्तेश्वरी दुर्गा धर्मार्थ सेवा समिति वाराणसी व अन्य की याचिका पर पारित किया। खंडपीठ ने स्पष्ट कहा कि व्यक्तिगत अधिकार, सार्वजनिक हित और जन सुरक्षा के अधिकारों पर प्रभावी नहीं हो सकते। यदि किसी भवन से आम जनता की जान-माल को खतरा है तो प्रशासन को वैधानिक अधिकारों के तहत तत्काल कार्रवाई करने की स्वतंत्रता है।
आदेश के प्रमुख बिंदु
जर्जर एवं खतरनाक भवन की स्थिति में सार्वजनिक सुरक्षा सर्वोच्च मानक होगी।
किरायेदार ध्वस्तीकरण की कार्रवाई में अवरोध नहीं बन सकते।
प्रशासन को कानून के तहत त्वरित और प्रभावी कार्रवाई का अधिकार है।
व्यक्तिगत अधिकार बनाम सार्वजनिक हित की स्थिति में सार्वजनिक हित को वरीयता दी जाएगी।
खंडपीठ ने अपने आदेश में कहा कि यदि किसी संरचना से जनहानि की आशंका हो तो प्रशासन की कार्रवाई को कानूनी संरक्षण प्राप्त है। अदालत का यह निर्णय उन मामलों में मार्गदर्शक सिद्ध होगा, जहां जर्जर भवनों को लेकर विवाद उत्पन्न होते हैं।
हालांकि न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी भवन को जर्जर घोषित करने की प्रक्रिया पारदर्शी, तकनीकी परीक्षण एवं विधिक प्रावधानों के अनुरूप होनी चाहिए। प्रशासनिक निर्णय का आधार इंजीनियरिंग रिपोर्ट, वैधानिक नोटिस और निष्पक्ष मूल्यांकन होना आवश्यक है, अन्यथा विवाद की स्थिति बन सकती है।
न्यायालय ने रेखांकित किया कि सार्वजनिक सुरक्षा सुनिश्चित करना प्रशासन का संवैधानिक दायित्व है और इसी सिद्धांत को लागू करते हुए यह आदेश पारित किया गया है।
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