जावेद अख्तर ने अपने करियर के शुरुआती दिनों में असिस्टेंट डायरेक्टर्स की स्थिति को लेकर बात की. उन्होंने बताया कि आज का दौर बहुत बदल गया, लेकिन तब बेहद अपमानजनक हुआ करती थी.
‘मैडम के जूते लाओ, हम ये सब करते थे’
पीटीआई के मुताबिक, जावेद अख्तर ने कहा कि पहले असिस्टेंट डायरेक्टर का काम सिर्फ तकनीकी या रचनात्मक सहयोग तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्हें सितारों के निजी कामों के लिए भी दौड़ाया जाता था. उन्होंने कहा, ‘आज फिल्म इंडस्ट्री पहले से कहीं ज्यादा व्यवस्थित हो गई है. जब मैं असिस्टेंट डायरेक्टर था, तब इस पद की कोई इज्जत नहीं थी. हमारा काम क्या था? ‘मैडम के जूते जल्दी लाओ’, ‘हीरो का कोट कहां है’, ‘जैकेट ढूंढो’. हम यही सब करते थे.’ उन्होंने मौजूदा दौर से तुलना करते हुए कहा कि आज के असिस्टेंट डायरेक्टर्स सितारों को सीधे नाम से बुलाते हैं, जो उनके जमाने में अकल्पनीय था. जावेद बोले, ‘आज के असिस्टेंट हीरो को उसके नाम से बुलाते हैं. यह देखकर मुझे डर लगता है. हम ऐसा सोच भी नहीं सकते थे.’
‘सेक्युलरिज्म कोई क्रैश कोर्स नहीं है’
जावेद अख्तर ने सेक्युलरिज्म पर भी अपने विचार शेयर किए. उन्होंने कहा कि सेक्युलरिज्म कोई क्रैश कोर्स नहीं है, जिसे भाषणों से सिखाया जा सके. यह जीवन जीने का तरीका है, जो आसपास के माहौल से अपने आप व्यक्ति के भीतर आता है. उन्होंने कहा, ‘अगर आपको एक दिन का लेक्चर दिया जाए और आप उसमें से A, B, C पॉइंट याद कर लें, तो वह बनावटी है, ज्यादा दिन टिक नहीं सकता. लेकिन अगर आपने अपने बड़ों को, जिनका आप सम्मान करते हैं, उसी तरह जीते देखा है तो वह स्वाभाविक रूप से आपके भीतर आ जाता है.’
50 पैसे गंवाए लेकिन मिली समझ
जावेद अख्तर ने अपने बचपन से जुड़ा एक किस्सा भी शेयर किया. उन्होंने बताया कि वह एक ऐसे परिवार में पले-बढ़े जहां अधिकांश लोग एग्नोस्टिक (अज्ञेयवादी) या नास्तिक थे. उन्होंने अपनी दादी का जिक्र करते हुए कहा कि वह पढ़ी-लिखी नहीं थीं, लेकिन उनमें गहरी समझ और संवेदनशीलता थी. बचपन में उनके दादा ने उन्हें धार्मिक छंद याद करने के बदले 50 पैसे देने का लालच दिया, लेकिन उनकी दादी ने इसका विरोध किया.
जब दादी ने कहा- किसी को किसी पर धर्म थोपने का हक नहीं
दादी ने बीच में दादा को टोक दिया और किसी को किसी पर धर्म थोपने का हक नहीं है. जावेद ने कहा, ‘उस दिन मेरी धार्मिक शिक्षा खत्म हो गई. उस वक्त मैं उनसे नाराज था क्योंकि 50 पैसे कमाने का मौका चला गया. लेकिन आज सोचता हूं तो वे एक ऐसी महिला थीं जो अपना नाम तक नहीं लिख सकती थीं, लेकिन उनमें इतनी संवेदनशीलता और समझ थी. काश हमारे नेताओं में उनकी दसवीं हिस्से की समझ भी होती.’











